
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए इलेक्टोरल बांड योजना को रद्द कर दिया। कोर्ट ने यह फैसला नागरिकों के सूचना के अधिकार के उल्लंघन के चलते सुनाया। इसके एक दिन बाद शुक्रवार को सरकार ने कहा है कि वह कोर्ट के आदेश का "अध्ययन" कर रही है।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सरकार चुनावी बांड रद्द किए जाने के बाद अब दूसरे विकल्पों पर विचार कर रही है। केंद्र सरकार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को खारिज करने जैसा कदम नहीं उठाना चाहती। सरकार को इस बात कि चिंता है कि चुनावी बांड योजना के रद्द होने से काले धन की वापसी हो सकती है। दूसरी ओर यह बताना कि दान किसने दिया (जैसा कि कोर्ट ने निर्देश दिया है) यह "बैंकिंग कानूनों के खिलाफ" है।
केंद्र सरकार 2017 में चुनावी बांड योजना लेकर आई थी। इसे राजनीतिक फंडिंग में काले धन की मात्रा कम करने के लिए लाया गया था। इस योजना का उद्देश्य दानदाताओं को गुप्त रूप से दान करने की सुविधा देना था।
भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि चुनावी बांड योजना चुनावों को पारदर्शी बनाने के लिए लाई गई थी। भाजपा कोर्ट के आदेश का सम्मान करेगी। कोर्ट के आदेश का अध्ययन के बाद भाजपा अपना अगला कदम तय करेगी।
क्या है चुनावी बांड?
चुनावी बांड वह बांड है जिसे सरकारी बैंक द्वारा जारी किया जाता था। इसे कोई व्यक्ति या कंपनी खरीद सकती थी और अपने पसंद की पार्टी को दे सकती थी। पार्टी द्वारा बांड को इनकैश कराया जाता था। इसे 2018 में भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने नकद दान के विकल्प के रूप में पेश किया था।
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चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार 2016 और 2022 के बीच 16,437.63 करोड़ रुपए के 28,030 चुनावी बांड बेचे गए। इनमें से भाजपा ने 10,000 करोड़ रुपए से अधिक की कमाई की। कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही। उसे 1,600 करोड़ रुपए के बांड मिले।
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