
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने ज़मीन रजिस्ट्रेशन और मालिकाना हक की संरचना में बड़े सुधारों की ज़रूरत बताई है। कोर्ट ने कहा है कि ब्रिटिश राज के ज़माने के कानूनों पर आधारित मौजूदा ढाँचा भ्रम, अक्षमता और बड़े पैमाने पर मुकदमों की वजह बन रहा है, और नए कानून बनाने की सलाह दी है। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जोयमाल्या बागची की बेंच ने सिफारिश की कि सरकार को इन समस्याओं को हल करने के लिए ब्लॉकचेन जैसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने पर विचार करना चाहिए। कोर्ट ने विधि आयोग को इस मामले पर एक विस्तृत अध्ययन करने का निर्देश दिया। आयोग से केंद्र और राज्य सरकारों, विशेषज्ञों और अन्य संबंधित पक्षों से सलाह-मशविरा करके एक रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है।
संपत्ति खरीदने और बेचने की व्यवस्था तीन सौ साल पुराने कानूनों से चलती है। उन्हें एक अलग युग में लागू किया गया था, लेकिन वे आज भी कानून की रीढ़ बने हुए हैं। ये कानून मालिकाना हक और रजिस्ट्रेशन के बीच की असमानता को बनाए रखते हैं। कोर्ट ने ये बातें 2008 के बिहार रजिस्ट्रेशन नियमों के नियम 19 को रद्द करते हुए कहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'ज़मीन रजिस्ट्रेशन की पुरानी व्यवस्था संपत्ति खरीदने और बेचने को मुश्किल और जटिल बनाती है। संपत्ति खरीदना कभी भी आसान नहीं होता, बल्कि यह एक चौंकाने वाला अनुभव होता है।'
लगभग 66% नागरिक विवाद संपत्ति से जुड़े होते हैं। ज़्यादातर ज़मीनी विवादों में मौजूदा व्यवस्था ही मुख्य दोषी है। पुराना कानूनी ढाँचा नकली दस्तावेज़ों, अतिक्रमण, देरी, बिचौलियों की भूमिका और राज्यों में अलग-अलग नियमों जैसी खामियों से भरा है। कोर्ट ने कहा कि सब-रजिस्ट्रार दफ्तरों में प्रशासनिक प्रक्रियाएँ बोझिल और समय लेने वाली हैं।
कोर्ट ने डिजिटल इंडिया भूमि रिकॉर्ड आधुनिकीकरण कार्यक्रम और राष्ट्रीय जेनेरिक दस्तावेज़ रजिस्ट्रेशन प्रणाली की सराहना करते हुए कहा कि सिर्फ डिजिटलीकरण से समस्या हल नहीं होगी। अगर रिकॉर्ड ही सही नहीं हैं, तो डिजिटल वर्शन गलतियों को और बढ़ा देगा।
कोर्ट ने सिफारिश की है कि केंद्र, राज्यों के साथ मिलकर 1882 के संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1908 के रजिस्ट्रेशन अधिनियम, 1899 के भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1872 के साक्ष्य अधिनियम, 2000 के सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और 2023 के डेटा संरक्षण अधिनियम की समीक्षा करे और उनमें संशोधन करे।
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