
नई दिल्ली। आज गुरु नानक देव जी का 550वां प्रकाशवर्ष पूरे देश में बहुत ही धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। यह त्योहार सिर्फ भारत में ही नहीं, दुनिया के किसी भी देश में रहने वाले सिख पूरी श्रद्धा के साथ मनाते हैं। यही नहीं, पड़ोसी देशों की सरकारें भी इस मौके पर स्मृति चिह्न और सिक्के जारी करती हैं। इस बार 550वें प्रकाशपर्व पर पाकिस्तान और नेपाल ने स्मृति चिह्न के रूप में सिक्के जारी किए हैं।
गुरुपरब सिख धर्म के सबसे पवित्र त्योहारों में से एक है। यह सिखों का सबसे बड़ा त्योहार है। इसे गुरु नानक देव जी जयंती के दिन मनाया जाता है। गुरु नानक देव जी ने ही सिख धर्म की शुरुआत की थी। इन्हें सिखों का पहला गुरु माना जाता है। गुरु नानक का जन्म रावी नदी के किनारे स्थित तलवंडी नामक गांव में कार्तिक पूर्णिमा को एक खत्री कुल में 1469 में हुआ था। यह पाकिस्तान में है। इसे ननकाना साहिब कहा जाता है।
गुरु नानक ने दूर-दूर की यात्राएं कर लोगों को समानता, शांति, प्रेम और अंधविश्वासों से दूर रहने की शिक्षा दी। उन्होंने एक एक ईश्वर की सत्ता की बात कही। गुरु नानक ने ऊंच-नीच के भेदभाव का विरोध किया और सदाचार पर आधारित आध्यात्मिक विचारों का प्रसार किया। गुरु नानक की जयंती के दो दिन पहले से ही गुरुद्वारों में गुरुग्रंथ साहिब का अखंड पाठ शुरू हो जाता है। यह 48 घंटे तक चलता है। उनकी जयंती से एक दिन पहले संध्या के समय एक जुलूस निकाला जाता है, जिसे नगर कीर्तन कहते हैं। इस जुलूस के आगे पंज प्यारे चलते हैं।
गुरुपरब की शुरुआत आसा दी बार के गायन से शुरू होती है। यह 24 छंदों का संग्रह है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इनकी रचना गुरु नानक देव ने ही की थी। इसके बाद लंगर का आयोजन होता है, जिसमें सिखों के अलावा बड़ी संख्या में दूसरे समुदायों के लोग भी शामिल होते हैं। लंगर की शुरुआत गुरु नानक देव ने ही की थी। इसमें एक साथ सभी लोग बैठ कर भोजन करते हैं। यहां अमीर-गरीब और जाति का कोई भेद नहीं होता है। लंगर का आयोजन हर गुरुद्वारे में किया जाता है।
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