
नई दिल्ली। केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी ने बुधवार को नई दिल्ली में 'बुद्धम शरणम गच्छामी' प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। इस दौरान कई सीनियर बौद्ध भिक्षु मौजूद थे। नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट्स में यह प्रदर्शनी लगाई गई है।
डेपुंग गोमंग विहार के कुंडलिंग तत्सक रिनपोछे इस कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि थे। अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ ने भी इस आयोजन में सक्रिय रूप से भाग लिया। प्रदर्शनी भगवान बुद्ध के जीवन पर आधारित है। इसमें दुनिया भर में बौद्ध कला और संस्कृति की यात्रा को दिखाया गया है। इसमें बौद्ध धर्म के इतिहास और दर्शन की झलक मिलती है।
प्रदर्शनी की शुरुआत दीप प्रज्वलन और वरिष्ठ बौद्ध भिक्षुओं के मंत्रोच्चारण के बीच हुई। इसके बाद "श्वेता मुक्ति" का प्रदर्शन किया गया, जिसमें कविता द्विबेदी और उनकी मंडली द्वारा ओडिसी नृत्य शैली में निर्वाण की स्त्री महिमा को प्रदर्शित किया गया।
मीनाक्षी लेखी बोलीं-आज भी प्रासंगिक हैं बुद्ध की शिक्षाएं
इस दौरान सभा को संबोधित करते हुए कुंडलिंग रिनपोछे ने बुद्ध की शिक्षाओं में करुणा की प्रासंगिकता और महत्व पर जोर दिया। मीनाक्षी लेखी ने कहा कि बुद्ध की शिक्षाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी कि 2500 साल पहले थीं। सिद्धार्थ गौतम का जन्म लुंबिनी में हुआ था। उन्होंने बोधगया में ज्ञान प्राप्त किया। आज दोनों स्थान- नेपाल और भारत, दोनों देशों को मजबूती से एक साथ बांधते हैं।
मीनाक्षी लेखी ने कहा कि भारत न केवल बौद्ध दर्शन का केंद्र है बल्कि कला और संस्कृति का भी केंद्र है। इसलिए भारत की जिम्मेदारी है कि वह बौद्ध धर्म के मूल्यों को दुनिया के सामने लाए। प्रदर्शनी में बौद्ध धर्म से जुड़ी कुछ दुर्लभ कलाकृति दिखाई गई है। कलाकार नंदलाल बोस की कृतियों को सामने लाने के का प्रयास किया गया है।
बता दें कि इस कार्यक्रम में कई देशों के राजदूतों ने हिस्सा लिया। नेपाल, म्यांमार, मंगोलिया, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, भूटान आदि जैसे महत्वपूर्ण बौद्ध आबादी वाले अधिकांश देशों के दूतावासों ने प्रदर्शनी में हिस्सा लिया। प्रदर्शनी में डेनमार्क, ग्रीस, लक्समबर्ग, जमैका, पुर्तगाल, जॉर्जिया, आइसलैंड, इक्वाडोर, सीरिया, पेरू जैसे देशों के राजदूतों ने भी भाग लिया।
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