
कोलकाता. प बंगाल में विधानसभा चुनाव काफी दिलचस्प होता जा रहा है। शनिवार को भाजपा ने विधानसभा चुनाव के लिए 57 सीटों पर उम्मीदवारों के नामों का ऐलान किया। इसमें प्रमुख नाम टीएमसी से भाजपा में शामिल हुए सुवेंदु अधिकारी का था। सुवेंदु अधिकारी नंदीग्राम से चुनाव लड़ेंगे। वे 2016 में भी इसी सीट से जीतकर पहुंचे थे। लेकिन खास बात ये है कि ममता बनर्जी भी इसी सीट से चुनाव मैदान में हैं, ऐसे में यह मुकाबला काफी रोचक होने वाला है।
दोनों नेताओं ने सीट को बताया खास
ममता बनर्जी ने नंदीग्राम में 18 जनवरी को हुई रैली में कहा था कि अगर मैं नंदीग्राम सीट से चुनाव लड़ूं यह कैसा रहेगा। यह मेरे दिल के करीब है। मैं अपना नाम भूल सकती हूं, लेकिन नंदीग्राम का नहीं। आज में ऐलान कर रही हूं कि नंदीग्राम से चुनाव लड़ूंगी।
सुवेंदु अधिकारी ने इस ऐलान के अगले दिन कहा कि पश्चिम बंगाल की सीएम 50 हजार वोटों से हारेंगी या वे राजनीति छोड़ देंगे। दरअसल, सुवेंदु अधिकारी के परिवार का नंदीग्राम पर खासा प्रभाव माना जाता है। सुवेंदु ममता सरकार में ट्रांसपोर्ट मंत्री रह चुके हैं। उन्हें टीएमसी में ममता के बाद प्रमुख नेताओं की लिस्ट में शामिल किया जाता था।
सुवेंदु के दावे में कितना दम
पूर्वी मिदनापुर के अंतर्गत 16 विधानसीटें आती हैं। इसके अलावा पश्चिमी मिदनापुर, बांकुरा और पुरुलिया जिलों की करीब 5 दर्जन सीटों पर अधिकारी परिवार का प्रभाव माना जाता है। इतना ही नहीं नंदीग्राम आंदोलन में सुवेंदु के कौशल को देखते हुए ममता बनर्जी ने मिदनापुर, बांकुरा और पुरुलिया में तृणमूल के विस्तार का काम सौंपा था।
क्या है सीट का गणित?
नंदीग्राम सीट की बात करें, तो यहां 70% हिंदू और 30% मुस्लिम वोटर हैं। यहां 2,13,000 वोटर में 1 लाख 51 हजार हिंदू वोटर हैं और 62 हजार मुस्लिम वोटर हैं। 2016 में इस सीट से सुवेंदु ने लेफ्ट के उम्मीदवार को मात दी थी।
नंदीग्राम आंदोलन से ममता ने बंगाल में जमीन तैयार की, सुवेंदु अहम भूमिका में थे
नंदीग्राम से 2016 में जीतने पर सुवेंदु को ममता सरकार में मंत्री बनाया गया था। सुवेंदु ने 2007 में नंदीग्राम आंदोलन में अहम भूमिका निभाई थी। नंदीग्राम में इंडोनेशियाई रासायनिक कंपनी के लिए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ एक आंदोलन हुआ था। इसका नेतृत्व ममता ने किया था। लेकिन इसके शिल्पी सुवेंदु ही थे। इस आंदोलन में खूनी हिंसा के दौरान कई लोगों को मौत भी हुई थी। इसके बाद लेफ्ट सरकार को झुकना पड़ा था। नंदीग्राम और हुगली के सिंगूर में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन ने ममता और तृणमूल कांग्रेस को बंगाल में जमीन तैयार करने में अहम भूमिका निभाई थी। इसी के बाद ममता यहां 34 साल से सत्ता में काबिज वाम मोर्चा को हटाने में सफल रही थीं।
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