कौन थीं निशात उन निसा बेगम? जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में कर दिया था पर्दा प्रथा का त्याग

Published : May 18, 2023, 06:00 PM IST
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सार

प्रसिद्ध भारतीय लेखक बृज नारायण चकबस्त ने 1918 में लिखा था कि मैं देश के युवाओं से अपील करता हूं कि वे निशात उन निसा बेगम के पास बैठें और सीखें कि कैसे स्वतंत्रता आंदोलन में जान फूंकी जाती है।

Who Is Nishat Un Nisa Begum. स्वतंत्रता आंदोलन में पर्दा प्रथा का त्याग करने वाली निशात उन निसा बेगम को बहुत कम लोग ही जानते थे। उनके पति मौलाना हसरत मोहानी को लोग ज्यादा जानते हैं जिन्होंने इंकलाब जिंदाबाद का स्लोगन लिखा था। यह नारा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे बड़ा नारा बना। लेकिन इतिहासकारों ने निशात के बारे में उतना नहीं लिखा, जैसा कि उस जमाने में महिलाओं के बारे में कम ही लिखा-पढ़ा जाता था। लेकिन निशात उन महिलाओं में एक थीं जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में अपने पति का कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया।

क्या थी निशात उन निसा की खासियत

निशात उन निसा बेगम के पति हसरत नोमानी ने माना था कि यदि उनकी शादी निशात से नहीं होती तो वे सिर्फ राजनैतिक संपादक बनकर रह जाते। मौलाना अब्दुल कलाम आजाद ने उन्हें धैर्य की प्रतिमूर्ति कहा था। महात्मा गांधी ने भी असहयोग आंदोलन के दौरान उनकी भूमिका को सराहा था।

कौन थीं निशात उन निसा बेगम

निशात उन निसा बेगम का जन्म 1885 में लखनऊ में हुआ था और उन्होंने घर से ही पढ़ाई की थी। उस दौर में भी उन्हें उर्दू, अरबी, पर्सियन और अंग्रेजी भाषा पर जबरदस्त पकड़ थी। 1901 में हसरत से शादी होने से पहले वे अपने घर पर ही गरीब लड़कियों को पढ़ाने का काम करती थीं। शादी के बाद वे राजनीति की दुनिया में दाखिल हो गईं। निशान और हसरत पहले मुस्लिम कपल थे जिन्होंने बाल गंगाधर तिलक के गरम दल का दामन थामा और अलीगढ़ में पहला स्वदेशी शॉप खोला। 1903 में इस कपल ने पहला राष्ट्रवादी उर्दू न्यूज पेपर उर्दू ए मौला की शुरूआत की। अंग्रेजों को यह हजम नहीं हुआ और हसरत को 1908 में जेल में डाल दिया गया। उनके रिहा होने के बाद उन्होंने फिर से अखबार की शुरूआत की। इस न्यूज पेपर में सिर्फ दो ही कर्मचारी थे हसरत और निशात।

हसरत को फिर से हुई जेल

प्रथम विश्व युद्ध की शुरूआत में हसरत को फिर से जेल भेज दिया गया। इसके बाद निशात दुनिया के सामने आईं और अपने पति के पक्ष के आंदोलन शुरू कर दिया। उन्होंने नेताओं के लेटर लिखे, न्यूज पेपर में आर्टिकल्स लिखे। वे जब कोर्ट जाती तो बुरका हटा देती थीं। उस दौर में बिना परदा के बाहर निकलना बहुत ही साहसिक फैसला था। हसरत के मित्र पंडित किशन कौल ने लिखा है कि- निशात ने उस दौर में यह साहस भरा निर्णय लिया जब मुस्लिम महिलाएं ही नहीं बल्कि हिंदू महिलाएं भी पर्दे में रहा करती थीं। उस वक्त कांग्रेस और दूसरी संस्थाए उनके लिए पैसे जमा कर रही थीं जो जेलों में बंद थे। निशात ने वह पैसा लेने से भी इंकार कर दिया। पंडित किशन प्रसाद ने उस बात का जिक्र किया है, जब1917 में अलीगढ़ पहुंचे थे तो देखा कि वे कितनी गरीबी में गुजर-बसर कर रही थीं। तब भी निशात बेगम ने कहा कि वे जिस हाल में हैं, बहुत खुश हैं। उन्होंने उन उर्दू किताबों को बेचने की बात जरूर कही जो उनके प्रेस में छापे गए थे।

एडविन मोंटागु से मिलीं निशात उन निसा बेगम

1917 में निशात बेगम ने ऑल इंडिया वुमेंस कांफ्रेंस के दौरान एडविन मोंटागु से मुलाकात की थी। इस दौरान उन्होंने सभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को जेल से रिहा करने की पुरजोर मांग की थी। निशात ने देश की भलाई के लिए पर्दा प्रथा का परित्याग किया था। जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद उन्होंने अमृतसर के कांग्रेस अधिवेशन में हिस्सा लिया। तब उन्होंने बिना पर्दे के अपनी स्पीच दी थी, तब उन्हें कॉमरेड ऑफ हसरत का नाम दिया गया था। बाद में कपल ने पूर्ण स्वराज्य की मांग को गति दी। हालांकि उस वक्त उनके पूर्ण स्वराज्य की मांग को महात्मा गांधी ने ठुकरा दिया लेकिन 8 साल के बाद कांग्रेस को यह मांग माननी पड़ी।

कांग्रेस के भी विरोध में उतरीं निशात

1922 में हसरत को फिर से जेल भेज दिया गया। तब निशात ने गया में हुए कांग्रेस अधिवेशन में हिस्सा लिया और कहा कि जो लोग पूर्ण स्वराज्य की मांग का समर्थन करते हैं, वे असेंबली न जाएं। क्योंकि यह असेंबली अंग्रेजों द्वारा ही बनाई गई थी। प्रोफेसर आबिदा समीउद्दीन के अनुसार निशात की राजनीति सिर्फ हसरत पर डिपेंड नहीं थी। वे पहली मुस्लिम महिला थीं जिन्होंने कांग्रेस अधिवेशन को संबोधित किया था। स्वदेशी के लिए उनका काम बेहद पॉपुलर हुआ। वे ऑल इंडिया वुमेंस कांफ्रेंस में बेबाक राय रखने वाली महिला रहीं। उन्होंने नेताओं को पत्र लिखे, न्यूजपेपर में आर्टिकल लिखे, जो यह बताता है कि स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी अकेली और बड़ी भूमिका थी। वे 1937 में मृत्यु से पहले तक स्वतंत्रता आंदोलन के लिए सक्रिय रहीं।

साभार- आवाज द वॉयस

लेखक- साकिब सलीम

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