
कोच्चि। पहली शादी के 29 साल बाद केरल के एक मुस्लिम जोड़े ने महिला दिवस के दिन 8 मार्च को दूसरी बार शादी की। दोनों ने पहली शादी शरिया कानून के अनुसार की थी। उन्हें 3 बेटियां हुईं। इस्लामी कानून के अनुसार- बेटियों को माता-पिता की संपत्ति में बराबर हिस्सा नहीं मिलता है। अपने बेटियों को इस अन्याय से बचाने के लिए दोनों ने स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत फिर से विवाह किया। इस कपल का नाम सी शुक्कुर और शीना है। शुक्कुर एक्टर और वकील हैं। वहीं, शीना महात्मा गांधी विश्वविद्यालय की पूर्व वाइस चांसलर हैं। दोनों ने 1994 में निकाह किया था।
दोबारा विवाह नहीं करते तो बेटियों को मिलता संपत्ति का दो तिहाई हिस्सा
शुक्कुर और शीना दोबारा विवाह नहीं करते तो उनकी तीनों बेटियों को माता-पिता की संपत्ति का सिर्फ दो तिहाई हिस्सा ही मिलता। मुस्लिम विरासत कानूनों के अनुसार- बेटियों को माता-पिता की संपत्ति का दो तिहाई ही मिलता है। बेटा नहीं होने की स्थिति में बाकी हिस्सा भाइयों को मिलता है। शुक्कुर ने फेसबुक पोस्ट कर अपने फैसले के बारे में बताया है। उन्होंने कहा कि शरिया कानून से बेटियों के साथ भेदभाव होता है। अपनी बेटियों को इससे बचाने के लिए हमने फिर से शादी करने का फैसला किया है। इससे मुस्लिम परिवारों को बेटियों के साथ हो रहे भेदभाव को खत्म करने का रास्ता मिलेगा। इसके साथ ही लड़कियों का आत्मविश्वास और सम्मान भी बढ़ेगा।
किस तरह काम करते हैं मुस्लिम विरासत कानून?
भारत में मुसलमानों के लिए विरासत मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट 1937 के अनुसार तय होता है। शरिया के अनुसार, माता-पिता की संपत्ति में उनके बेटे-बेटियों को हिस्सा मिलने की दो स्थिति है। 12 कैटेगरी हैं जिनमें उत्तराधिकारियों को विरासत में हिस्सा मिलता है। 1. पति, 2. पत्नी, 3. बेटी, 4. बेटे की बेटी, 5. पिता, 6. दादा, 7. मां, 8. दादी, 9. बहन, 10 Consanguine sister, 11. एक मां से पैदा होने वाली बहनें और 12. एक मां से पैदा होने वाले भाई।
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चाची, चाचा, भतीजी, भतीजे और अन्य दूर के रिश्तेदार को भी संपत्ति का हिस्सा मिल सकता है। उन्हें कितना हिस्सा मिलेगा यह कई बातों पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए पति की मौत होने पर पत्नी को पति की संपत्ति का 1/8 हिस्सा मिलता है (अगर उसे बेटा-बेटी हो)। बेटा-बेटी नहीं होने पर पत्नी को संपत्ति का 1/4 हिस्सा मिलता है। बेटियों को बेटों की तुलना में आधे से ज्यादा हिस्सा नहीं मिल सकता। एक मुसलमान की संपत्ति केवल एक मुसलमान के पास जा सकती है।
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