
नेशनल डेस्क। द्वितीय विश्व युद्द में विभिन्न देशों के लाखों सैनिकों ने हिस्सा लिया था। युद्ध में भारतीय सेना की ओर से शामिल शामिल जवानों में शामिल सूबेदार थानसिया का निधन हो गया। 102 वर्ष की आयु में थानसेनिया ने अंतिम सांसें लीं। कोहिमा में तैनाती के दौरान सुबेदार ने विपरीत हालात में भी शौर्यता दिखाते हुए मित्र देशों को जीत दिलाई थी। थानसिया को उन्हें कोहिमा की लड़ाई में वीरता के लिए आज भी याद किया जाता है। थानसेनिया मिजोरम के रहने वाले थे।
पहले असम रेजीमेंट स्थापित करने में रहा महत्वपूर्ण रोल
सूबेदार थानसिया असम रेजीमेंट में तैनात किए गए थे। असम रेजीमेंट के इस्टैबलिश होने में भी थानसेनिया का बड़ा योगदान था। जेसामी में तैनाती के दौरान उन्होंने सेना के प्रति अपने जिम्मेदारी निभाते हुए रेजीमेंट को स्थापित करने में काफी महत्पूर्ण रोल अदा किया था।
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रिटायरमेंट के बाद सामाजिक गतिविधियों में एक्टिव
सेना ने कहा कि थानसिया आर्मी से रिटायरमेंट के बाद भी काफी ऐक्टिव रहे। सूबेदार थानसिया ने कम्यूनिटी और देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाते रहे। कई सारे समाज हितों और शिक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर भी थानसिया हमेशा से अपनी राय देते रहे और सरकार की सहायता में मददगार रहे। आर्मी के मुताबिक थानसिया का जीवन काफी प्रभावशाली रहा है और देश के जवानों को उनसे सीख लेनी चाहिए। नियमों के पक्के होने के साथ ही सामाज के लिए या कहें आम नागरिकों के लिए वह काफी लिबरल रहते थे।
असम रेजिमेंट ने दी श्रद्धांजति
असम रेजीमेंट ने थानसिया के निधन पर गहरा शोक व्यक्ति किया है। इसके साथ ही सूबेदार थानसिया का पूरे सैन्य सम्मान के लिए अंतिम संस्कार किया गया। गार्ड ऑफ ऑनर देने के साथ उन्हें पंचतत्व में विलीन किया गया।
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