मेरठ में 10,000 दलितों ने पहना जनेऊ, बोले- 'भेदभाव और सियासी फूट से तंग आ गए थे'

Published : Apr 27, 2026, 04:53 PM IST
Dalits in Meerut Adopt Brahminism to Protest Discrimination

सार

मेरठ में लगभग 10,000 दलितों ने जनेऊ धारण कर ब्राह्मण धर्म अपना लिया है। उन्होंने यह कदम सामाजिक भेदभाव और विभाजनकारी राजनीति के विरोध में उठाया। इसका उद्देश्य समाज में समानता का संदेश देना है।

हमारे देश में धर्म और जाति के नाम पर होने वाली बहस कभी खत्म नहीं होती। पुरानी मान्यताओं के हिसाब से समाज को चार वर्णों में बांटा गया था- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। कहा जाता है कि यह बंटवारा जन्म पर नहीं, बल्कि कर्म यानी काम पर आधारित था। जैसे ज्ञान और शिक्षा देने वाले ब्राह्मण, रक्षा करने वाले क्षत्रिय, व्यापार करने वाले वैश्य और सेवा कार्य करने वाले शूद्र। इसका मकसद समाज को व्यवस्थित तरीके से चलाना था।

वक्त के साथ कैसे बदले हालात

लेकिन, वक्त के साथ ये व्यवस्था जन्म आधारित हो गई और समाज में ऊंच-नीच की भावना घर कर गई। यह किसी से छिपा नहीं है। एक तरफ जहां कुछ लोग खुद को श्रेष्ठ और दूसरों को छोटा समझते हैं, वहीं दूसरी तरफ नेता अपनी राजनीति चमकाने के लिए समाज को एकजुट नहीं होने देते। हालांकि, यह भी एक गलत धारणा है कि मंदिरों में सिर्फ ब्राह्मण ही पूजा कर सकते हैं। भारत में कई जगहों पर, स्थानीय समुदाय के लोग ही अपने देवी-देवताओं की पूजा सदियों से करते आ रहे हैं। फिर भी, जाति के नाम पर टकराव की खबरें आती रहती हैं।

10 हजार दलित बने ब्राह्मण

इन सब बहसों के बीच उत्तर प्रदेश के मेरठ से एक अनोखी खबर आई है। यहां करीब 10,000 दलितों ने जनेऊ धारण करके ब्राह्मण धर्म को अपना लिया है। जनेऊ, जो तीन धागों का एक समूह होता है, ब्राह्मण समुदाय में इसका खास महत्व है। माना जाता है कि ये तीन धागे तीन वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), तीन गुणों (सत्व, रजस, तमस) और त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) के प्रतीक हैं। पूरे विधि-विधान के साथ इसे धारण करने के बाद अब ये 10 हजार लोग ब्राह्मण समुदाय का हिस्सा बन गए हैं।

क्या बोले ये लोग?

जब इन लोगों से इस फैसले के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने अलग-अलग वजहें बताईं। कई लोगों ने कहा कि उन्हें ब्राह्मण समुदाय के रीति-रिवाज और परंपराएं अच्छी लगीं, इसलिए उन्होंने यह कदम उठाया। वहीं, कुछ लोगों का कहना था कि वे समाज में फैले भेदभाव से तंग आ चुके थे और समानता का संदेश देना चाहते थे। कुछ ने तो सीधे-सीधे राजनीतिक दलों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, "नेता हमें बांटकर अपनी सियासी रोटियां सेंकते हैं। हम एकजुट होना चाहते हैं, लेकिन वे हमें होने नहीं देते। अब देखते हैं कि वे क्या करेंगे।"

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