यादों का ट्रेन वाला स्वाद: 1990 के दशक में कुछ हटके था भारतीय ट्रेनों का खाना

Published : Feb 18, 2026, 09:43 AM IST
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सार

1990 के दशक में ट्रेन का खाना अलग था। कोई एक जैसी कैटरिंग पॉलिसी नहीं थी, इसलिए हर रूट पर स्थानीय स्वाद मिलते थे। शाकाहारी थाली, अंडा करी और स्टेशनों पर मिलने वाले समोसे-कचौड़ी जैसे स्नैक्स आम थे।

एक ज़माना था जब आज की तरह तेज़ रफ़्तार वाली ट्रेनें या उंगलियों पर खाना ऑर्डर करने वाले मोबाइल ऐप नहीं हुआ करते थे। 1990 के दशक में भारतीय रेलवे की यात्राओं का एक अलग ही मज़ा और अपनी यादें थीं। उस दौर में रेलवे में खाने-पीने का इंतज़ाम आज जैसा बिल्कुल नहीं था। चलिए, 90 के दशक के उस ट्रेन वाले स्वाद के बारे में और जानते हैं।

तरह-तरह के स्वाद

आज के IRCTC सिस्टम से पहले, भारतीय रेलवे की कोई एक जैसी कैटरिंग पॉलिसी नहीं थी। हर रेलवे ज़ोन खाने-पीने का इंतज़ाम अपने-अपने हिसाब से करता था। लंबी दूरी की ट्रेनों में खाना ट्रेन के अंदर ही बनता था, जबकि बड़े स्टेशनों पर बने रिफ्रेशमेंट रूम और प्राइवेट ठेकेदार भी खाना सप्लाई करने में मदद करते थे। इसी वजह से, हर रूट पर यात्रियों को अलग-अलग मेन्यू और स्थानीय स्वाद चखने को मिलते थे।

शाकाहारी थाली

उस ज़माने में ट्रेनों में सबसे ज़्यादा मशहूर शाकाहारी थाली हुआ करती थी। इसमें चावल या चपाती, दाल, एक सादी सी सब्ज़ी और अचार मुख्य रूप से होते थे। चलती ट्रेन में आसानी से बनने और गर्म होने वाला यह खाना सेहत के लिए भी अच्छा और पचाने में भी आसान होता था। लंबी यात्राओं के लिए मेन्यू में पुलाव और खिचड़ी भी शामिल होते थे।

अंडे के पकवानों का क्रेज़

नॉन-वेज में अंडे से बनी चीज़ें सबसे ज़्यादा पसंद की जाती थीं। नाश्ते में ऑमलेट और मुख्य भोजन में अंडा करी मिलती थी। चिकन से बने पकवान कुछ चुनिंदा रूटों पर ही मिलते थे। अगर मटन खाना हो, तो उसके लिए बड़े स्टेशनों की कैंटीन पर ही निर्भर रहना पड़ता था।

हर इलाके का स्वाद सबसे ज़्यादा नाश्ते में झलकता था। उत्तर भारत के रूट पर गरमागरम आलू पराठा और दही मिलता था, तो वहीं दक्षिण भारत के रूट पर इडली, उपमा और पोंगल को ज़्यादा पसंद किया जाता था। ब्रेड-बटर तो लगभग सभी ज़ोन में आम तौर पर मिल जाता था।

समोसा, कचौड़ी, कटलेट और वड़े

स्टेशन पर ट्रेन का रुकना यात्रियों के लिए किसी त्योहार से कम नहीं होता था। डिब्बों में घूम-घूमकर बिकने वाले समोसे, कचौड़ी और कटलेट के अलावा, बड़े जंक्शनों पर अखबार में लिपटे गरमागरम पकौड़े और वड़े सफ़र का मज़ा दोगुना कर देते थे। चाय वाले भी खूब नज़र आते थे।

सोन पापड़ी, गुलाब जामुन और बेसन के लड्डू उस दौर की मुख्य मिठाइयां थीं। आज की तरह बोतलबंद पानी उस समय आम नहीं था। यात्री या तो घर से पानी लेकर चलते थे या फिर प्लेटफॉर्म पर लगे नलों से अपनी बोतलें भर लेते थे।

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