छह बार डिप्टी CM, मगर CM नहीं, अजित पवार का वो अधूरा सपना और पूरी सियासत

Published : Jan 28, 2026, 11:15 AM IST

Ajit Pawar Death : महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार का बारामती में प्लेन क्रैश में निधन हो गया। सत्ता के केंद्र में रहने वाले अजित पवार का राजनीतिक सफर, बारामती से लेकर उपमुख्यमंत्री पद तक, पढ़िए उनकी ताकत, प्रभाव और विरासत की पूरी कहानी।

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वो नेता जो सत्ता से कभी बाहर नहीं हुआ, आज राजनीति से हमेशा के लिए विदा

महाराष्ट्र की राजनीति में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जो सिर्फ पदों से नहीं, बल्कि अपने वजूद, पकड़ और फैसलों से पहचाने जाते हैं। अजित पवार उन्हीं में से एक थे। सत्ता बदली, सरकारें आईं-गईं, गठबंधन टूटे-जुड़े, लेकिन एक बात लंबे समय तक लगभग तय रही, अजित पवार सत्ता के केंद्र से बाहर नहीं होंगे। आज उनके असामयिक निधन की खबर ने न केवल राजनीति को, बल्कि उस दौर को भी विराम दे दिया है, जिसमें “पावर पॉलिटिक्स” का सबसे मजबूत चेहरा अजित पवार माने जाते थे।

बारामती में हुए प्लेन क्रैश ने उस नेता को छीन लिया, जिसने दशकों तक महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई। वे गंभीर रूप से घायल अवस्था में अस्पताल ले जाए गए, लेकिन बचाए नहीं जा सके। इस हादसे में विमान में सवार सभी लोगों की मौत हो गई। यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि राज्य की राजनीति के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ है।

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सत्ता के इर्द-गिर्द रहने की कला

अजित पवार को लेकर राजनीतिक गलियारों में एक जुमला अक्सर दोहराया जाता था “इन्हें सत्ता से बाहर करना आसान नहीं है।” यह बात यूं ही नहीं कही जाती थी। चाहे कांग्रेस-एनसीपी की सरकार हो, या बाद के वर्षों में बदले राजनीतिक समीकरण, अजित पवार हर बार किसी न किसी रूप में सत्ता की धुरी बने रहे।

वे छह बार उपमुख्यमंत्री बने। यह आंकड़ा नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक उपयोगिता का प्रमाण था। सरकार चलानी हो, नंबर मैनेजमेंट करना हो या प्रशासनिक फैसलों को जमीन पर उतारना, अजित पवार का नाम सबसे पहले लिया जाता था।

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मुख्यमंत्री की कुर्सी से एक कदम दूर

राजनीति के इस लंबे सफर में एक विरोधाभास भी रहा। इतनी ताकत, इतना अनुभव, इतनी स्वीकार्यता, फिर भी मुख्यमंत्री की कुर्सी उनसे हमेशा एक कदम दूर रही। समर्थकों का मानना था कि वे “सिस्टम चलाने वाले नेता” थे, जबकि आलोचक कहते थे कि उनकी आक्रामक शैली कई बार उनके ही रास्ते में दीवार बन गई। लेकिन इस सच्चाई से कोई इनकार नहीं कर सकता कि मुख्यमंत्री न बनने के बावजूद वे कई मुख्यमंत्रियों से ज्यादा प्रभावशाली रहे।

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बारामती: सिर्फ सीट नहीं, राजनीतिक किला

बारामती अजित पवार के लिए सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं था, बल्कि राजनीतिक शक्ति का प्रतीक था। 1995 में पहली बार विधायक बनने के बाद उन्होंने इस सीट को अपनी अभेद्य किलेबंदी बना लिया। 2025 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपने ही परिवार के सदस्य युग्रेंद्र पवार को हराकर यह साफ कर दिया कि बारामती में अंतिम फैसला अब भी उनका ही चलता है। लगातार सात बार विधायक चुना जाना सिर्फ लोकप्रियता नहीं, बल्कि संगठन, प्रशासन और जमीनी पकड़ का नतीजा था।

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सहकारिता से सत्ता तक का सफर

अजित पवार की राजनीति की जड़ें सहकारिता में थीं। 23 साल की उम्र में कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्री के बोर्ड से शुरू हुआ सफर, 1991 में पुणे सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक की अध्यक्षता तक पहुंचा और वहां वे 16 साल टिके रहे। इसी साल वे पहली बार सांसद भी बने। यह दौर बताता है कि वे सिर्फ चुनावी नेता नहीं थे, बल्कि संस्थागत राजनीति को समझने और साधने वाले राजनेता थे।

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मंत्रालय और फैसले: जहां ताकत दिखी

सिंचाई, जल संसाधन, ग्रामीण विकास जैसे विभाग, ये मंत्रालय केवल नाम के नहीं होते। यहां फैसले सीधे किसानों, गांवों और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं। अजित पवार ने इन मंत्रालयों में रहते हुए कठोर और तेज फैसलों के लिए पहचान बनाई। उनके समर्थक उन्हें “काम कराने वाला नेता” कहते थे, तो आलोचक “अत्यधिक शक्तिशाली मंत्री”। लेकिन दोनों ही यह मानते थे कि प्रशासन में उनकी पकड़ असाधारण थी।

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एक ऐसा नेता, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता था

अजित पवार की राजनीति की सबसे बड़ी खासियत यही रही आप उनसे सहमत हों या असहमत, उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते थे। वे गठबंधन सरकारों की रीढ़ बने, कई बार संकटमोचक बने और कई बार खुद संकट का केंद्र भी। आज उनके जाने के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में एक खालीपन है, जिसे भरना आसान नहीं होगा। वो शख्स, जो कभी सत्ता से बाहर नहीं हुआ, आज राजनीति से हमेशा के लिए बाहर हो गया।

अजित पवार का अध्याय खत्म हुआ है, लेकिन उनकी बनाई हुई राजनीतिक लकीरें महाराष्ट्र की सियासत में लंबे समय तक दिखाई देती रहेंगी।

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