ट्रंप की गजब कूटनीति: टैरिफ किंग को मनाने कई देशों ने सबकुछ दांव पर लगाया

Published : Jan 14, 2026, 06:57 PM IST
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सार

डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका की एशिया नीति साझेदारी से हटकर टैरिफ और परफॉर्मेंस-आधारित डिप्लोमेसी पर आ गई है। जापान, दक्षिण कोरिया और मलेशिया ने दबाव, दिखावे और व्यक्तिगत डील्स के जरिए राहत पाने की रणनीति अपनाई है।

ऑथर: सेरीन जोशुआ

अपने दूसरे कार्यकाल के करीब एक साल बाद डोनाल्ड ट्रंप का साउथ-ईस्ट और ईस्ट-एशियन देशों के मुख्य साझेदारों के प्रति रवैया यह साफ दिखाता है कि ट्रंप ने अपने दूसरे टर्म में अमेरिकी कूटनीति को कैसे बदला है। महीनों तक टैरिफ की धमकियां, टूटे हुए गठबंधन और बातचीत, जो अप्रैल के "लिबरेशन डे" टैरिफ से शुरू हुई और हाल ही में एशिया दौरों तक पहुंची, कूटनीति का एक ऐसा तरीका दिखाती हैं, जो पार्टनरशिप पर कम और परफॉर्मेंस पर कहीं ज्यादा बेस्ड है। पूर्व राजनयिक इसे 'ज्यादा लेन-देन वाला' बता रहे हैं, जहां म्यूचुअल रिस्पेक्ट और विन-विन वाले नतीजों के बजाय व्यक्तिगत पहुंच प्रभाव तय करती है।

ट्रंप ने "लिबरेशन डे" पर लगभग सभी अमेरिकी व्यापारिक साझेदारों पर 10 से 50% तक के रेसिप्रोकल टैरिफ (पारस्परिक शुल्क) का ऐलान किया। नतीजा ये हुआ कि 50 से ज्यादा देशों में उनसे बातचीत के लिए होड़ मच गई। वहीं, चीन और कनाडा जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने 155 बिलियन डॉलर के अमेरिकी सामानों पर समान टैरिफ लगाकर जवाबी एक्शन लिया। इसके साथ ही यूरोपीय संघ ने जवाब दिया कि वह ट्रेड वॉर के लिए तैयार है। हालांकि, इस दौरान जापान, मलेशिया और दक्षिण कोरिया का जवाब इन सबसे बिल्कुल अलग था।

जो बातचीत उनकी जियोपॉलिटिकल ताकत को दिखाने के लिए शुरू हुई थी, वह अक्टूबर समिट के दौरान ट्रंप को खुश करने और आर्थिक मदद पाने के लिए सोच-समझकर की गई परफॉर्मेंस में खत्म हुई। इस तरह, साउथ-ईस्ट और ईस्टर्न एशिया ने मौजूदा अमेरिकी प्रशासन के साथ एक पर्सनल, दिखावटी और दबाव वाली डिप्लोमेसी में एक बड़ा बदलाव दिखाया।

बातचीत से लेकर दिशा-निर्देशों तक…

अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में, ट्रंप के अपने एशियाई सहयोगियों के साथ संबंध अच्छे थे। जापानी प्रधानमंत्री इशिबा की फरवरी की यात्रा का अच्छा स्वागत हुआ। ट्रंप ने उनकी और दोनों देशों की दशकों पुरानी दोस्ती की तारीफ की। दक्षिण कोरिया और मलेशिया के साथ भी लगातार राजनयिक संबंध बने रहे। हालांकि, अप्रैल के टैरिफ ने डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति को कुछ इस तरह से पक्का कर दिया कि इसे ऐतिहासिक साझेदारी या गठबंधनों से बचाया नहीं जा सकता।

इस दौरान, ट्रंप के आरोप एक पैटर्न पर आधारित थे, मसलन जापान ने अमेरिकी कारों और चावल को ब्लॉक कर दिया, जबकि दक्षिण कोरिया ने सैन्य सहायता मिलने के बावजूद अमेरिका से 4 गुना ज्यादा टैरिफ लगाया। इसके जवाब में, दक्षिण कोरिया के कार्यवाहक राष्ट्रपति हान डक-सू ने साफ तौर पर कहा कि जवाबी कार्रवाई करने से स्थिति में सुधार नहीं होगा। इसके साथ ही दक्षिण कोरियाई अधिकारी अक्सर वाशिंगटन जाकर राहत पाने की कोशिश करते रहे।

इसी तरह, जापान के इकोनॉमी मिनिस्टर रयोसेई अकाजावा को 7 अप्रैल को टैरिफ के लिए मुख्य वार्ताकार के रूप में विशेष रूप से नियुक्त किया गया था। अधिकारियों ने WTO प्रॉसिजर्स पर भरोसा करने के बजाय रियायत के माध्यम से राहत हासिल करने पर फोकस करते हुए वाशिंगटन की कई यात्राएं कीं। अमेरिका के साथ लंबे समय के गठबंधन से सुरक्षा न मिलने के कारण मलेशिया ज्यादा कमजोर था। ट्रंप के टैरिफ के असर ने मलेशिया की डोमेस्टिक ग्रोथ को अस्थिर कर दिया, जिसके चलते मई में उसे संसद का एक खास सत्र बुलाना पड़ा।

यूएस सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने पहले भी इस बात पर जोर दिया था कि सरकारें "टेबल पर आने, इसे पूरा करने और फिर घर जाकर इस पर कैंपेन करने के लिए ज्यादा उत्सुक हैं।" बातचीत के इस बिजनेस-स्टाइल फ्रेमिंग से अमेरिकी और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नीति में बदलाव का पता चलता है- एक ऐसी नीति जहां, देश राष्ट्रीय हितों और लंबे समय की पार्टनरशिप की रक्षा पर ध्यान देने वाले सोच-समझकर किए गए समझौतों के बजाय 'क्विक डील्स' के लिए ट्रंप के दबाव के आगे झुक रहे हैं।

ट्रंप के जुलाई में अलग-अलग देशों को लिखे गए लेटर असल में अल्टीमेटम थे, जिसमें रिश्तों के आधार पर 'ऊपर या नीचे' बदलाव की चेतावनियों के साथ टैरिफ रेट तय किए गए थे। हर लेटर में व्यापार घाटे को अमेरिकी अर्थव्यवस्था और खासकर उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बताया गया था।

पार्टनरशिप से परफॉर्मेंस तक…

जब तक ट्रंप ने 2025 के आखिर में साउथ-ईस्ट और ईस्टर्न एशिया में अपने हाई-प्रोफाइल दौरे शुरू किए, तब तक तीनों देशों ने यह मान लिया था कि अच्छे नतीजे पाने के लिए ट्रंप को एक विस्तृत और दिखावटी तरीके से मान्यता देना जरूरी है, जैसा कि उनके 6 दिनी एशिया दौरे के दौरान देखा गया।

इन देशों का स्ट्रैटेजिक रिस्पांस साफ था। चीन की बढ़ती आक्रामकता, कमजोर होते WTO उपायों और अमेरिकी बाजार पर मजबूत आर्थिक निर्भरता के बीच फंसे होने के कारण, उनके पास ट्रंप को खुश करने और व्यक्तिगत जुड़ाव बनाने के अलावा कोई दूसरा ऑप्शन नहीं था।

दक्षिण कोरिया में ट्रंप के आगमन की शुरुआत युद्धक विमानों द्वारा उनके एयर फोर्स वन को एस्कॉर्ट करने, 21 तोपों की सलामी के दौरान मिलिट्री बैंड द्वारा YMCA की परफॉर्मेंस और ट्रंप को दक्षिण कोरिया के सर्वोच्च सम्मान के साथ सिला-युग के सोने के मुकुट की प्रतिकृति भेंट करने जैसी शानदार तस्वीरों से हुई। इस दौरान ट्रंप की पसंद के अनुसार, वहां के राष्ट्रपति ली ने कस्टम गोल्ड टाई भी पहनी थी।

जापान में ट्रंप का स्वागत सोने से सजे महल के कमरों में किया गया, जहां प्रधानमंत्री ताकाइची ने अपने गुरु दिवंगत प्रधानमंत्री शिंजो आबे को याद करते हुए संबंधों के 'सुनहरे युग' का प्रतीक भी दिखाया। अमेरिकी चावल और बीफ से तैयार किए गए लंच के दौरान ताकाइची ने जापान के निवेश को दिखाने वाला एक नक्शा भी पेश किया।

मलेशिया में टरमैक पर ट्रंप का नाचना यह दिखाता है कि वहां उनका स्वागत कितना असरदार था। प्रधानमंत्री इब्राहिम ने तो प्रोटोकॉल तोड़कर ट्रंप की लिमोजिन में सवारी भी की। ये दिखावे सिर्फ सजावट नहीं थे, बल्कि एक ऐसे राष्ट्रपति के प्रति गहरी, ज्यादा सोची-समझी प्रतिक्रिया का संकेत थे, जो बहुत ज्यादा दिखाई देने वाली वफादारी को महत्व देते हैं। इस तरह भव्यता ट्रंप के दूसरे कार्यकयाल यानी 2.0 में सबसे कीमती चीजों में से एक बन जाती है।

शिखर सम्मेलन के बाद, ट्रंप तारीफों से भरे हुए थे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वह किसी भी समय जापान की मदद करेंगे। उन्होंने प्रधानमंत्री ताकाइची के साथ अच्छे संबंधों का वादा किया। इसके साथ ही जापान 15% टैरिफ दर बनाए रखने में कामयाब रहा और यह इंश्योर किया कि 550 बिलियन डॉलर के निवेश MOU को फिर से बढ़ाया नहीं जाएगा। इसके साथ ही उसने एक नई रेयर अर्थ मिनरल्स डील भी की। ट्रंप ने मलेशिया को एक महान और जीवंत देश कहा। इसके साथ ही मलेशिया ने 19% टैरिफ हासिल किया, जिसमें 1711 टैरिफ लाइंस को 0% टैरिफ रेट के साथ छूट दी गई।

ट्रंप ने दक्षिण कोरिया की यात्रा को एक शानदार प्रधानमंत्री के साथ एक खास दौरा बताया। इस दौरे में कई महीनों की मुश्किल बातचीत के बाद साउथ कोरिया ने टैरिफ में 25% से 15% की कमी हासिल की। साथ ही सालाना 20 बिलियन डॉलर का कैश इन्वेस्टमेंट और अमेरिकी शिपबिल्डिंग ऑपरेशंस के लिए 150 बिलियन डॉलर देने का वादा किया।

गठबंधन का टैरिफिकेशन…

पिछले एक साल में ट्रंप की डिप्लोमेसी की एक बड़ी खासियत यह रही है कि कैसे टैरिफ ने जापान, दक्षिण कोरिया और मलेशिया जैसे देशों के साथ अमेरिका के रिश्तों पर असर डाला है। ऐसी नीतियां जो कभी सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता, टेक्नोलॉजी और साझा लोकतांत्रिक मूल्यों में रणनीतिक सहयोग और पार्टनरशिप को बढ़ाने की कोशिश करती थीं, उन्हें बड़े पैमाने पर टैरिफ में राहत पाने के लिए इस्तेमाल करते हुए, उन पर पर्दा डाल दिया गया। वहीं, ट्रेडिशनल अलायंसेस एक-दूसरे के सहयोग के कई आयामों पर फोकस करते हैं। ट्रंप 2.0 में बातचीत टैरिफ के अलावा सिर्फ इस बात पर फोकस्ड रही कि तमाम देश उन्हें रोकने के लिए किस तरह की प्रतिक्रिया दे सकते हैं।

एशिया में इन सम्मेलनों ने बस उसी बात को पक्का किया, जो इन देशों ने महीनों की अनियमित बातचीत से महसूस किया था कि ट्रंप के साथ, स्थिर नीतिगत चर्चाओं के नतीजे शायद ही कभी निकलते हैं। सोने के मुकुट, कस्टम टाई और पर्सनलाइज़्ड गिफ्ट्स स्ट्रैटेजिक कैल्कुलेशन हैं, जिनका मकसद ट्रंप की चापलूसी और दिखावा कर उन्हें खुश करना है। ऐसे काम, जो सार्वजनिक रूप से देखने में उनकी अथॉरिटी को टैरिफ किंग के रूप में दिखाते हैं, वे ट्रंप के स्वभाव को किसी सजा देने वाले शख्स से बचाव करने वाले इंसान में बदलने का एक आसान तरीका है।

ट्रंप प्रशासन के दूसरे साल में ASEAN की तरह क्षेत्रीय ढांचों को कमजोर होते हुए देख सकता है, जो पारंपरिक रूप से सामूहिक सौदेबाजी और नियमों पर आधारित जुड़ाव को बढ़ावा देते हैं। चूंकि अलग-अलग देश पर्सनलाइज्ड डील के ज़रिए वाशिंगटन का फेवर पाने के लिए भाग-दौड़ कर रहे हैं, ऐसे में सुरक्षा हो या जलवायु, अन्य साझा चुनौतियों के लिए भविष्य में समन्वित क्षेत्रीय प्रतिक्रियाएं तेजी से धुंधली होती दिख रही हैं।

(सेरीन जोशुआ कार्नेगी इंडिया में सिक्योरिटी स्टडीज प्रोग्राम में यंग एंबेसडर हैं। उन्होंने अशोका यूनिवर्सिटी से सोशियोलॉजी में बैचलर डिग्री और इंटरनेशनल रिलेशन्स में माइनर डिग्री हासिल की है। सेरीन ने पहले कोइटा सेंटर फॉर डिजिटल हेल्थ और कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव में रिसर्च असिस्टेंट के तौर पर काम किया है। उनकी रिसर्च भारत की डिजिटल इकॉनमी पर फोकस्ड थी। इसका संबंध हेल्थ पॉलिसी और RTI रिफॉर्म से था, जिसमें पारदर्शिता और पब्लिक हेल्थ डिलीवरी को एग्जामिन किया गया।)

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