
Annamalai BJP Left Impact: तमिलनाडु के पूर्व बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष के अन्नामलाई अब बीजेपी से चले गए हैं और अपनी पार्टी भी बना ली है। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में एक सवाल तेजी से घूम रहा है, क्या अन्नामलाई के BJP छोड़ने से सिर्फ एक नेता पार्टी से गया है या फिर उसके साथ हजारों युवा समर्थक भी निकल जाएंगे? यह सवाल इसलिए बड़ा है, क्योंकि अन्नामलाई सिर्फ एक राजनीतिक चेहरा नहीं थे। पिछले कुछ सालों में उन्होंने खुद को सोशल मीडिया, ग्राउंड कैंपेन और आक्रामक राजनीति के जरिए युवाओं के बीच एक अलग पहचान दिलाई थी। अब जब उन्होंने अपनी नई राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया है, तो सबकी नजर इस बात पर है कि उनकी असली ताकत कितनी है।
तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से कुछ स्थापित चेहरों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। ऐसे माहौल में एक पूर्व IPS अधिकारी का राजनीति में आना और सीधे बड़े नेताओं को चुनौती देना युवाओं को अलग लगा। अन्नामलाई की सबसे बड़ी ताकत उनकी डिजिटल मौजूदगी रही। उनके भाषणों के छोटे वीडियो, प्रेस कॉन्फ्रेंस के क्लिप और सरकार पर तीखे सवाल अक्सर सोशल मीडिया पर वायरल होते रहे। यही वजह है कि कई युवा उन्हें पारंपरिक नेता की बजाय 'नई सोच वाला नेता' मानने लगे। उन्हें सोशल मीडिया पर रियल लाइफ का 'सिंघम' भी कहा जाता है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि किसी भी नेता के लाखों व्यूज और फॉलोअर्स होना एक बात है, लेकिन चुनाव में वोट मिलना पूरी तरह अलग खेल होता है। अन्नामलाई की लोकप्रियता जरूर बढ़ी, लेकिन चुनावी नतीजों में उसका असर उतना बड़ा नहीं दिखा। ऐसे में यह मान लेना कि पूरा युवा वोटबैंक उनके साथ चला जाएगा, शायद जल्दबाजी होगी। हालांकि, ये भी सच है कि उन्होंने BJP को उन युवाओं तक पहुंचाया, जो पहले पार्टी की राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेते थे।
अन्नामलाई के जाने के बाद BJP को दो मोर्चों पर काम करना होगा। पहला, तमिलनाडु में युवाओं के बीच अपनी पकड़ बनाए रखना। दूसरा राज्य में ऐसा चेहरा तैयार करना जो जनता से सीधे जुड़ सके। पिछले कुछ सालों में राज्य में BJP का चेहरा अगर कोई था, तो वह अन्नामलाई ही थे। ऐसे में उनके जाने से एक खाली जगह जरूर बनी है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नई पार्टी बनने से सबसे ज्यादा असर विपक्षी वोटों के बंटवारे पर पड़ सकता है। अगर अन्नामलाई अपने समर्थकों को संगठित करने में सफल रहते हैं, तो कुछ शहरी सीटों और युवा वोटरों पर उनका असर दिखाई दे सकता है। लेकिन नई पार्टी को मजबूत संगठन खड़ा करना, उम्मीदवार चुनना और पूरे राज्य में नेटवर्क बनाना आसान काम नहीं होगा।
राजनीतिक जानकार कहते हैं कि बीजेपी को पूरी तरह डरने की जरूरत नहीं है। तमिलनाडु में BJP का एक बड़ा हिस्सा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे वोटर सिर्फ किसी एक राज्य नेता के आधार पर फैसला नहीं लेते। इसके अलावा गठबंधन राजनीति भी BJP के लिए राहत का कारण बन सकती है। यानी नुकसान होगा या नहीं, इसका जवाब अभी भविष्य के पास है।
राजनीतिक जानकार कहते हैं कि, अन्नामलाई के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करने की है कि उनकी लोकप्रियता सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है। अगर वे युवाओं को संगठन में बदल पाते हैं, तो तमिलनाडु की राजनीति में नया अध्याय शुरू हो सकता है। लेकिन अगर यह समर्थन केवल ऑनलाइन दुनिया तक सीमित रहा, तो नई पार्टी को लंबा संघर्ष करना पड़ सकता है। फिलहाल इतना तय है कि अन्नामलाई के फैसले ने तमिलनाडु की राजनीति को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
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