Bansa Sharif Dargah Barabanki: बाराबंकी की बांसा शरीफ दरगाह को रूहानी ताकतों की अदालत कहा जाता है। मान्यता है कि यहां शैतानी साये की पेशी होती है और पीड़ित लोग ठीक होकर लौटते हैं। जानिए इस रहस्यमयी दरगाह से जुड़ी मान्यताएं।
आधुनिक दौर में भले ही विज्ञान और तर्क को सबसे बड़ा आधार माना जाता हो, लेकिन समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी उन घटनाओं से रूबरू होता है, जिन्हें सामान्य शब्दों में समझा पाना आसान नहीं होता। भूत-प्रेत, ऊपरी हवा या नकारात्मक शक्तियों को लेकर लोग खुले तौर पर भले ही भरोसा न जताएं, लेकिन जब किसी अपने के व्यवहार में अचानक बदलाव आता है, तो सवाल खुद-ब-खुद खड़े हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में स्थित बांसा शरीफ दरगाह को लेकर भी कुछ ऐसी ही मान्यताएं प्रचलित हैं, जहां कथित तौर पर शैतानी और नकारात्मक शक्तियों की “पेशी” लगाई जाती है।
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लखनऊ से सटे बाराबंकी में स्थित है बांसा शरीफ दरगाह
राजधानी लखनऊ से सटे बाराबंकी जिले की बांसा शरीफ दरगाह को लोग रूहानी ताकतों की अदालत के रूप में देखते हैं। मान्यता है कि यहां पहुंचते ही शैतानी साए कमजोर पड़ने लगते हैं। दरगाह में आने वाले कई लोगों का व्यवहार सामान्य नहीं होता। कोई चीखता-चिल्लाता नजर आता है, तो कोई असहनीय दर्द की शिकायत करता है। कुछ लोग खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश भी करते हैं, जिसे उनके साथ मौजूद परिजन कथित प्रेत बाधा का असर बताते हैं।
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पेशी, सुनवाई और सजा की मान्यता
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, जब किसी व्यक्ति को शैतानी साये से पीड़ित माना जाता है, तो उसकी दरगाह में पेशी होती है। इसके बाद सुनवाई की प्रक्रिया चलती है और फिर उस नकारात्मक शक्ति को सजा सुनाई जाती है। बताया जाता है कि इस प्रक्रिया के दौरान पीड़ित व्यक्ति कुछ समय के लिए बेहोश हो जाता है। जब उसे होश आता है, तो उसका व्यवहार पूरी तरह सामान्य नजर आता है, मानो वह कभी बीमार ही न रहा हो।
बांसा शरीफ दरगाह को रूहानी ताकतों की सबसे बड़ी अदालत कहा जाता है। यहां उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों से भी लोग पहुंचते हैं। दरगाह देखने में भले ही अन्य धार्मिक स्थलों जैसी लगे, लेकिन यहां आने वाले कुछ लोग बेड़ियों में जकड़े होते हैं, तो कुछ को कई लोग मिलकर संभालते नजर आते हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि यह स्थान “आसिबी दरगाह” है, जहां शैतानी साये से पीड़ित लोग ठीक होते हैं।
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खिदमत करने वालों का दावा
दरगाह में सेवा करने वाले लोगों का कहना है कि यहां आने वाले अधिकांश लोग अपने जीवन में अत्यधिक मानसिक और शारीरिक पीड़ा से गुजर रहे होते हैं। उनके अनुसार, बांसा शरीफ दरगाह में आने के बाद कई लोगों की परेशानियां धीरे-धीरे दूर हो जाती हैं। चाहे वह मानसिक तनाव हो, शारीरिक बीमारी हो या फिर किसी प्रकार की रूहानी बाधा—यहां आकर लोगों को राहत मिलती है।
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आस्था और रहस्य का संगम
बांसा शरीफ दरगाह से जुड़ी ये मान्यताएं आस्था और रहस्य का ऐसा संगम हैं, जिन पर विश्वास करना या न करना व्यक्ति की सोच पर निर्भर करता है। हालांकि, यह भी सच है कि यहां आने वाले कई लोग अपने अनुभवों को जीवन बदलने वाला बताते हैं। यही वजह है कि तमाम सवालों और तर्कों के बावजूद, बांसा शरीफ दरगाह आज भी आस्था का बड़ा केंद्र बनी हुई है, जहां लोग उम्मीद और सुकून की तलाश में पहुंचते हैं।
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