SC ST Reservation: बिहार में आरक्षण नीति को लेकर सत्तारूढ़ NDA के भीतर मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं। Rashtriya Lok Morcha (RLM) के नेता और पंचायती राज मंत्री Deepak Prakash ने आरक्षण के लाभ को सबसे वंचित तबकों तक पहुंचाने के लिए कोटे के भीतर उपवर्गीकरण की जरूरत बताई है। उनकी यह मांग Hindustani Awam Morcha (Secular) के नेताओं के रुख से मिलती है। वहीं LJP (Ram Vilas) प्रमुख और केंद्रीय मंत्री Chirag Paswan ने SC/ST आरक्षण में किसी भी तरह की समीक्षा या उपवर्गीकरण का विरोध किया है।
जमुई में शनिवार को मीडिया से बातचीत में Deepak Prakash ने कहा कि सामाजिक समानता केवल आरक्षण के सहारे हासिल नहीं की जा सकती। इसके लिए शिक्षा सबसे अहम माध्यम है और सरकार व समाज को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर बच्चे को बेहतर शिक्षा मिले।
उन्होंने आरक्षण के भीतर उपवर्गीकरण की जरूरत पर भी जोर दिया। उनका तर्क है कि इससे आरक्षण का लाभ उन समुदायों तक पहुंचाया जा सकेगा जो वास्तव में सबसे ज्यादा वंचित हैं। RLM बिहार में NDA का हिस्सा है।
इस बहस में HAM(S) भी उपवर्गीकरण के पक्ष में खुलकर सामने आया है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्य मंत्री Santosh Kumar Suman ने कहा है कि आजादी के करीब आठ दशक बाद यह समीक्षा जरूरी है कि आरक्षण का लाभ किन वर्गों तक पहुंचा और कौन से समुदाय अब भी पीछे रह गए।
उन्होंने खास तौर पर अनुसूचित जाति के भीतर Musahar जैसे बेहद वंचित समुदायों का मुद्दा उठाया और SC/ST कोटे में उपश्रेणीकरण का समर्थन किया। उनके पिता और केंद्रीय मंत्री Jitan Ram Manjhi भी इस मांग के समर्थन में सार्वजनिक बयान दे चुके हैं।
आरक्षण पर चल रही बहस में पूर्व सांसद Anand Mohan ने भी समीक्षा की जरूरत बताई है। उनका कहना है कि जिस व्यवस्था का उद्देश्य सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाना था, उसके करीब 80 साल बाद यह देखना जरूरी है कि उसका लाभ वास्तविक रूप से सबसे जरूरतमंदों तक पहुंच रहा है या नहीं। उनके मुताबिक पिछड़े वर्गों के भीतर भी प्रभावशाली तबके उभरे हैं। ऐसे में लगातार उन्हीं समूहों को लाभ मिलता रहना आरक्षण के मूल उद्देश्य को कमजोर कर सकता है।
दूसरी ओर Chirag Paswan ने SC/ST आरक्षण की समीक्षा और उपवर्गीकरण के विचार को साफ तौर पर खारिज किया है। उनका कहना है कि SC/ST के लिए आरक्षण आर्थिक स्थिति पर आधारित नहीं है, बल्कि सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता के ऐतिहासिक अनुभव से जुड़ा है।
इसी मुद्दे पर NDA के भीतर बयानबाजी भी तेज हो गई है। Paswan ने Manjhi और Santosh Suman से इस्तीफे की मांग की, जिसके जवाब में दोनों नेताओं ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि अगर सबसे वंचित तबकों की पहचान के लिए आंकड़ों के आधार पर समीक्षा की मांग गलत है, तो Paswan को भी अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
विपक्ष के नेता Tejashwi Prasad Yadav भी आरक्षण के मुद्दे पर NDA को घेर चुके हैं। उन्होंने कहा है कि आरक्षण की व्यवस्था से छेड़छाड़ की किसी कोशिश को स्वीकार नहीं किया जाएगा। साथ ही उन्होंने NDA नेताओं पर RSS के दबाव में काम करने का आरोप लगाया और बढ़े हुए आरक्षण को लेकर उनकी प्रतिबद्धता पर सवाल उठाए।
इस पूरे विवाद में BJP ने फिलहाल खुलकर कोई पक्ष नहीं लिया है। इसकी एक वजह 2015 का विधानसभा चुनाव भी माना जा रहा है। उस समय RSS प्रमुख Mohan Bhagwat की आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा संबंधी टिप्पणी को विपक्ष ने बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था।
उस विवाद के बाद आरक्षण का सवाल बिहार की राजनीति में बेहद संवेदनशील मुद्दा बन गया था। ऐसे में BJP के लिए मौजूदा समय में गठबंधन के भीतर चल रही इस बहस पर सीधे प्रतिक्रिया देना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है।
यानी बिहार NDA में आरक्षण को लेकर सवाल सिर्फ नीति का नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व और गठबंधन की राजनीति का भी बनता जा रहा है।
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