
Pakistan Military Airlift: दक्षिण एशिया का भू-राजनीतिक माहौल एक बार फिर नई रणनीतिक करवट लेता दिखाई दे रहा है। पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र में पिछले 60 घंटों के दौरान देखी गई असामान्य और तीव्र सैन्य उड़ानों ने रक्षा विश्लेषकों और भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं। रावलपिंडी के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण नूर खान एयरबेस और कराची के मसरूर एयरबेस पर चीन और तुर्की के भारी सैन्य परिवहन विमानों का लगातार उतरना और उड़ान भरना, इस क्षेत्र में एक नए सुरक्षा समीकरण की ओर इशारा कर रहा है।
News18 की एक रिपाेर्ट के मुताबिक सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, पिछले ढाई दिनों में चीनी और तुर्की वायु सेना के भारी-भरकम कार्गो विमानों ने पाकिस्तानी एयरबेस के कई चक्कर लगाए हैं। आमतौर पर नियमित प्रशिक्षण उड़ानों या प्रोटोकॉल यात्राओं का ऐसा पैटर्न नहीं होता। लगभग 60 घंटे तक चली इस लगातार आवाजाही को एक्सपर्ट्स सामान्य द्विपक्षीय गतिविधियों से अलग, किसी बड़े 'लॉजिस्टिकल मूवमेंट' या बड़े पैमाने पर सैन्य आपूर्ति का संकेत मान रहे हैं।
आशंका जताई जा रही है कि इस सीक्रेट एयरलिफ्ट के जरिए पाकिस्तान को अत्याधुनिक मिलिट्री हार्डवेयर delivered किए गए हैं। सूत्रों का दावा है कि इन खेपों में मुख्य रूप से उन्नत कॉम्बैट ड्रोन (UAVs), एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी और एयर-डिफेंस सिस्टम से जुड़े कलपुर्जे शामिल हो सकते हैं। पाकिस्तान वर्षों से चीनी लड़ाकू विमानों और मिसाइल प्रणालियों पर निर्भर रहा है, जबकि तुर्की से उसकी बेयरकटार जैसी आधुनिक ड्रोन तकनीक और नेवल सिस्टम की डील लगातार मजबूत हुई है। हाल ही में दोनों देशों के लगभग 200 इंजीनियरों के तुर्की के 'KAAN' फिफ्थ-जेनरेशन फाइटर प्रोग्राम में शामिल होने की खबर ने इस रक्षा गठजोड़ को और ज्यादा गहरा कर दिया है।
INDIA IS WATCHING & TRACKING
CHINA-TÜRKIYE’S PAK AIRLIFT EXPOSED.
60-HOUR MILITARY SURGE
Chinese warplanes at Pak Bases. Turkiye flies in drones and war gear.
Timing is awkward and consequential as this arms boost to Pak comes ahead of SCO & BRICS meets.
MANOJ GUPTA reports… pic.twitter.com/kMg2f6MUDd— Rahul Shivshankar (@RShivshankar) August 20, 2026
यह असामान्य हवाई हलचल 7 अगस्त को हस्ताक्षरित 'मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट' के ठीक बाद देखने को मिली है। पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच हुए इस समझौते में प्रावधान है कि किसी एक देश पर हुआ हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। भले ही इस समझौते को आधिकारिक तौर पर 'रक्षात्मक' बताया गया हो, लेकिन जिस गति से चीन और तुर्की के सैन्य विमान इस्लामाबाद के करीब रसद पहुंचा रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि यह नेटवर्क केवल कागजी समझौतों तक सीमित नहीं है।
उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं पर एक साथ मिल रही चुनौतियों के बीच भारत इस स्थिति पर बारीकी से नज़र बनाए हुए है। चीन-पाकिस्तान-तुर्की के इस बढ़ते 'टैक्टिकल एक्सिस' के चलते भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान अपनी एयर-डिफेंस और इंटेलिजेंस सर्विलांस प्रणालियों को और अधिक मुस्तैद कर रहे हैं, ताकि किसी भी संभावित असंतुलन या सीमा पार की हलचल का सही समय पर माकूल जवाब दिया जा सके।
सबसे बड़ा सवाल 60 घंटे की इस कथित असामान्य गतिविधि को लेकर है। सुरक्षा सूत्रों ने सैन्य परिवहन विमानों की लगातार आवाजाही को सामान्य द्विपक्षीय सैन्य गतिविधि से अलग बताया है और इसे संभावित लॉजिस्टिकल तैयारी से जोड़ा है। पाकिस्तान पहले ही चीनी और तुर्की मूल के ड्रोन तथा अन्य मानवरहित प्रणालियों का इस्तेमाल बढ़ा चुका है। यदि हालिया एयरलिफ्ट में सैन्य उपकरणों के परिवहन की पुष्टि होती है, तो यह पाकिस्तान की अपनी सैन्य क्षमताओं को तेजी से अपग्रेड करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
भारत के लिए यह गतिविधि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पाकिस्तान एक साथ चीन और तुर्की के साथ रक्षा सहयोग को मजबूत कर रहा है। खासकर ड्रोन, एयर डिफेंस, लड़ाकू विमान और एयरोस्पेस तकनीक जैसे क्षेत्रों में बढ़ता सहयोग क्षेत्रीय सैन्य संतुलन पर असर डाल सकता है। फिलहाल, कथित उड़ानों में क्या सामग्री थी और उनका वास्तविक उद्देश्य क्या था, इसकी आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है। लेकिन 60 घंटे की लगातार सैन्य एयरलिफ्ट, दो प्रमुख साझेदार देश और पाकिस्तान के रणनीतिक एयरबेस-इन तीनों का एक साथ सामने आना भारत समेत पूरे क्षेत्र के लिए निगरानी का विषय जरूर बन गया है।
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