कौन हैं 'सुपरकॉप' दामयंती सेन? जिनका 14 साल बाद सुवेंदु सरकार में खत्म हुआ वनवास, मिला बड़ा जिम्मा!

Published : May 19, 2026, 08:48 AM IST
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सार

14 साल पहले Park Street Gangrape Case की जांच कर सुर्खियों में आईं IPS दामयंती सेन अब फिर सत्ता के केंद्र में हैं। ममता सरकार में ‘किनारे’ की गईं अफसर को सुवेंदु अधिकारी सरकार ने महिला अपराध जांच समिति में बड़ी भूमिका दी है। क्या यह सिर्फ वापसी है या पुराने राजनीतिक राज़ फिर खुलने वाले हैं? 

IPS Damayanti Sen: पश्चिम बंगाल की सियासत और पुलिस महकमे में एक ऐसा फैसला लिया गया है जिसने पुराने जख्मों और विवादों को एक बार फिर जिंदा कर दिया है। राज्य के नए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने एक ऐसा दांव खेला है, जिसने हर किसी को चौंका दिया है। साल 2012 के बहुचर्चित 'पार्क स्ट्रीट गैंगरेप केस' की जांच करने वाली और तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार के गुस्से का शिकार होकर पिछले 14 सालों से हाशिए पर चल रही 1996 बैच की तेज-तर्रार IPS अधिकारी दामयंती सेन की मुख्यधारा में ऐतिहासिक वापसी हुई है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने सूबे में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाली हिंसा को रोकने और उनकी जांच के लिए गठित एक बेहद शक्तिशाली और हाई-प्रोफाइल कमेटी में दामयंती सेन को सदस्य सचिव (Member Secretary) जैसी सबसे अहम भूमिका सौंप दी है।

वह खौफनाक रात और ममता बनर्जी का 'मनगढ़ंत' वाला दावा

इस कहानी की शुरुआत होती है 6 फरवरी 2012 की उस सर्द रात से, जब कोलकाता के रसूखदार इलाके पार्क स्ट्रीट के एक नाइट क्लब से लौट रही सुज़ेट जॉर्डन नामक महिला का एक चलती गाड़ी में सामूहिक बलात्कार किया गया था। यह घटना ठीक उस वक्त हुई थी जब ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार नई-नई सत्ता में आई थी। राज्य की कानून व्यवस्था पर उठते सवालों के बीच तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सार्वजनिक तौर पर इस जघन्य वारदात को सरकार की छवि खराब करने के लिए रची गई एक "सजानो घोटोना" यानी 'मनगढ़ंत कहानी' करार दे दिया था। मुख्यमंत्री के इस बयान ने पूरी पुलिस व्यवस्था पर एक अघोषित दबाव बना दिया था, लेकिन तब इस मामले की कमान एक ऐसी महिला के हाथ में थी जो डिगने वालों में से नहीं थी।

 

 

सच की कीमत और लालबाजार से बैरकपुर का वो 'सजा' वाला तबादला

कोलकाता पुलिस के इतिहास में पहली महिला संयुक्त पुलिस आयुक्त (क्राइम) बनने का गौरव हासिल करने वाली दामयंती सेन ने तत्कालीन मुख्यमंत्री के राजनीतिक बयान की परवाह न करते हुए पेशेवर ईमानदारी की मिसाल पेश की। उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर कुछ ही दिनों के भीतर न सिर्फ अपराधियों का पता लगाया, बल्कि अदालत के सामने अकाट्य सबूत पेश कर यह साबित कर दिया कि सामूहिक बलात्कार की वह वारदात कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं बल्कि एक कड़वी और खौफनाक हकीकत थी। लेकिन सच का साथ देने की कीमत दामयंती सेन को भारी प्रशासनिक नुकसान से चुकानी पड़ी। केस सुलझने के तुरंत बाद ही ममता बनर्जी ने उन्हें कोलकाता पुलिस मुख्यालय (लालबाजार) से हटाकर बैरकपुर कमिश्नरेट के एक बेहद कम महत्वपूर्ण और 'साइड पोस्ट' पर ट्रांसफर कर दिया। उसके बाद से पूरे टीएमसी कार्यकाल के दौरान उन्हें जानबूझकर किसी बड़े केस की जांच नहीं सौंपी गई।

1 जून से शुरू होगा 'न्याय का नया दौर': सुवेंदु सरकार का मास्टरस्ट्रोक

दामयंती सेन की काबिलियत को पहचानते हुए अब सुवेंदु अधिकारी सरकार उन्हें पूरे सम्मान के साथ वापस लाई है। रिटायर्ड जस्टिस समाप्ती चटर्जी की अध्यक्षता में बनी यह नई विशेष समिति पुलिस थानों में महिलाओं और बच्चों की शिकायतों पर सीधे एक्शन लेगी और जन सुनवाई की तर्ज पर काम करेगी। यह समिति 1 जून से आधिकारिक तौर पर जमीन पर उतरने वाली है और दामयंती सेन ने इसके लिए प्रासंगिक डेटा और सबूत जुटाने का काम युद्ध स्तर पर शुरू भी कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुवेंदु अधिकारी ने सेन को यह जिम्मेदारी देकर न केवल महिलाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता दी है, बल्कि पूर्ववर्ती सरकार को यह कड़ा संदेश भी दिया है कि उनके राज में सच को दबाने वाले नहीं, बल्कि सच का साथ देने वाले अधिकारियों को सिर आंखों पर बिठाया जाएगा।

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