
दरभंगा: भारत-चीन युद्ध के दौरान देश को 600 किलो सोना दान कर मुश्किल समय में मदद करने वाली बिहार के दरभंगा की आखिरी रानी कामसुंदरी देवी का निधन हो गया है। वह 96 साल की थीं और काफी दिनों से बीमार चल रही थीं। सिर्फ 8 साल की उम्र में उनकी शादी दरभंगा महाराज की तीसरी पत्नी के रूप में हुई थी। सोमवार सुबह अपने कल्याणी निवास पर उनका निधन हो गया, जिससे ऐतिहासिक दरभंगा राजघराना एक बार फिर चर्चा में आ गया है।
दरभंगा राजघराने ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन, शिक्षा, संस्कृति और राष्ट्रीय संकटों में बहुत बड़ा योगदान दिया था, जिसका आधुनिक इतिहास में ज्यादा जिक्र नहीं मिलता। सोमवार को रानी कामसुंदरी देवी का अंतिम संस्कार दरभंगा राज परिसर में शाही परंपराओं के अनुसार किया गया। उनकी अंतिम यात्रा में हजारों लोग शामिल हुए। कामेश्वर नगर के मादेश्वरनाथ परिसर में ही राजपरिवार के सभी महाराजाओं और महारानियों का अंतिम संस्कार किया जाता है। रानी कामसुंदरी देवी का अंतिम संस्कार भी वहीं किया गया।
महारानी कामसुंदरी देवी दरभंगा राज के आखिरी राजा महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं और उनकी शादी 1940 के दशक में हुई थी। 1962 में महाराजा कामेश्वर सिंह का निधन हो गया। उनकी पहली पत्नी महारानी राजलक्ष्मी देवी का 1976 में और दूसरी पत्नी महारानी कामेश्वरी प्रिया का 1940 में निधन हो गया था। महाराजा को किसी भी शादी से कोई संतान नहीं थी।
1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान, सरकार की अपील पर सबसे पहले दरभंगा महाराज ने ही मदद की थी। दरभंगा के इंद्रभवन मैदान में 15 मन यानी 600 किलो सोना तौलकर सरकार को दान दिया गया था। इसके साथ ही, तीन विमान और अपना 90 एकड़ का निजी हवाई अड्डा भी दान कर दिया था। आज दरभंगा हवाई अड्डा उसी शाही परिवार की दान की हुई जमीन पर बना है।
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