
Ecommerce Food Safety: क्या आप जानते हैं कि जिस वक्त आप अपने स्मार्टफोन पर 'प्लेस ऑर्डर' का बटन दबाते हैं, ठीक उसी पल आपकी सेहत के साथ एक बहुत बड़ा जुआ खेला जा रहा होता है? आज भारत के करोड़ों घरों में किचन का राशन सुपरमार्केट से नहीं, बल्कि ई-कॉमर्स और क्विक-कॉमर्स ऐप्स के ज़रिए आ रहा है। यह तेज़ है, सुविधाजनक है और समय बचाता है। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि इस चमक-दमक भरी रफ्तार के पीछे आपसे आपकी ज़िंदगी की सबसे बुनियादी जानकारी छिपाई जा रही है? एक मशहूर गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. पलानीअप्पन मणिकम ने इस डिजिटल शॉपिंग के उस काले सच से पर्दा उठाया है, जो सीधे आपकी रसोई और आपके पेट से जुड़ा है।
दुकान में जाकर सामान खरीदते वक्त हमारी उंगलियां सबसे पहले पैकेट के पीछे छपी 'मैन्युफैक्चरिंग' और 'एक्सपायरी डेट' को टटोलती थीं। लेकिन स्क्रीन पर दिखते खूबसूरत डिब्बों के पीछे यह तारीखें गायब हैं। बहुत से लोग सोचते हैं कि एक्सपायरी डेट का मतलब सिर्फ फूड पॉइज़निंग है। लेकिन सच इससे कहीं ज़्यादा डरावना है। अलग-अलग तारीखें आपके शरीर के लिए अलग-अलग सिग्नल होती हैं। एक्सपायरी डेट यह तय करती है कि वह प्रोडक्ट कब आपके लिए 'असुरक्षित' या ज़हरीला हो सकता है। वहीं, 'बेस्ट-बिफोर' डेट भले ही खाने को सेफ़ रखे, लेकिन उस तारीख के निकलते ही भोजन का स्वाद, खुशबू और उसके पोषक तत्व (Nutritional Value) पूरी तरह दम तोड़ देते हैं। बिना यह जाने कि दही का जो टब आप मंगा रहे हैं, वह दो दिन पहले बना था या दो महीने पहले—क्या आप अपनी सेहत को खतरे में नहीं डाल रहे?
पहले जब लोग सुपरमार्केट या किराना स्टोर जाते थे, तो पैकेट उठाकर उसकी मैन्युफैक्चरिंग डेट, एक्सपायरी डेट, इंग्रीडिएंट्स और न्यूट्रिशन लेबल आसानी से देख सकते थे। कई लोग एक ही प्रोडक्ट के दो पैकेटों में से ज्यादा फ्रेश विकल्प चुनते थे। लेकिन ऑनलाइन शॉपिंग में यह सुविधा अक्सर उपलब्ध नहीं होती। ग्राहक केवल तस्वीर और सीमित जानकारी देखकर ऑर्डर कर देते हैं। इससे यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि जो उत्पाद खरीदा जा रहा है, वह कितना ताजा है और उसकी शेल्फ लाइफ कितनी बची है।
आजकल 10 मिनट में डिलीवरी का दावा करने वाले क्विक कॉमर्स ऐप्स को लेकर उपभोक्ताओं की शिकायतें अचानक आसमान छूने लगी हैं। इस अंधी दौड़ का सबसे डरावना पहलू यह है कि ग्राहकों को मलबे की तरह वो सामान थमाया जा रहा है, जो अपनी शेल्फ लाइफ के बिल्कुल आखिरी कगार पर है। यानी घर पहुंचते ही या तो वह एक्सपायर होने वाला होता है, या फिर उसका असली वज़न लिस्टेड वज़न से काफी कम निकलता है। पारदर्शिता की इस कमी के कारण गंभीर बीमारियां जैसे-डायबिटीज, किडनी इन्फेक्शन, कमजोर इम्यूनिटी वाले मरीज़ और मासूम बच्चों के माता-पिता अनजाने में मौत का सामान घर ला रहे हैं।
इस पूरे खेल में सबसे बड़ा सस्पेंस यह है कि क्या ये प्लेटफॉर्म्स कानून से भी ऊपर हैं? भारत का 'लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट' और 'कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट' साफ तौर पर यह निर्देश देता है कि हर ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म को सामान बेचने से पहले उसकी मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपायरी डेट स्क्रीन पर दिखाना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इसके बावजूद, यह जानकारी तब तक छिपाई जाती है जब तक कि पैकेट आपके घर डिलीवर न हो जाए। यह सिर्फ एक तकनीकी चूक नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं के भरोसे और सेहत के साथ किया जा रहा एक संगठित खिलवाड़ है। यदि ऐसी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जाती, तो संबंधित विक्रेता और प्लेटफॉर्म दोनों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। उपभोक्ता शिकायत होने पर रिफंड, रिप्लेसमेंट या उपभोक्ता आयोग का भी सहारा ले सकते हैं।
हेल्थ हमेशा सही और सोच-समझकर किए गए फैसलों से शुरू होती है। अगर आप किसी मॉल या सुपरमार्केट की रैक पर खड़े होकर सामान की पूरी कुंडली खंगाल सकते हैं, तो डिजिटल दुनिया में यह अधिकार आपसे क्यों छीना जा रहा है? अगर आपको भी कभी ऐसा संदिग्ध या एक्सपायरी के करीब का सामान मिला है, तो चुप बैठने के बजाय तुरंत प्लेटफॉर्म के शिकायत निवारण सिस्टम, नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन या FSSAI को इसकी रिपोर्ट करें। याद रखें, बेहतर जानकारी ही आपकी बेहतर सेहत की चाबी है-ऑर्डर करने से पहले सवाल पूछना शुरू कीजिए!
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