Harish Rana Funeral : इच्छामृत्यु पाने वाले गाजियाबाद के हरीश राणा का दिल्ली के ग्रीन पार्क में अंतिम संस्कार हो गया। इस दौरान हर एक ने नाम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई दी। परिवार ने हरीश का हृदय वाल्व और दो कार्निया दान किए हैं।
देश में इच्छामृत्यु पाने वाले गाजियाबाद के पहले व्यक्ति हरीश राणा का आज 25 मार्च को दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट में अंतिम संस्कार हो गया। परिवार, रिश्तेदारों और स्थानीय लोगों ने नम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई दी।
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पिता ने आखिरी बार बेटे को किया प्रणाण
दरअसल, बुधवार सुबह करीब 8 बजे हरीश राणा का पार्थिव शरीर दिल्ली के मुक्तिधाम पहुंचा। जिस वक्त अर्थी से घर से निकली तो देखने वालों की आंखों में आंसू आ गए। इसी बीच हरीश के पिता अशोक राणा ने बेटे की अर्थी को कंधा दिया और आखिरी बार प्रणाम करते हुए बहुत बड़ी बात कह दी।
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हरीश राणा के पिता ने कही दिल छूने वाली बात
हरीश राणा के पिता अशोक राणा ने रोते हुए लोगों के सामने हाथ जोड़े। कहा कि कोई रोना मत। बेटा शांति से जाए, इसलिए प्रार्थना कर रहा हूं। बेटा अब जहां जन्म लें, उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।
हरीश मरकर भी कई लोगों को जिदंगी दे गया। परिवार ने हरीश का हृदय वाल्व और दो कार्निया दान किए हैं। बता दें कि परिवार ने किडनी, लीवर, हृदय, फेफड़े और आंत जैसे कई अंगों के दान की इच्छा जताई थी, लेकिन एम्स की मेडिकल टीम द्वारा जांच के बाद, केवल कॉर्निया और हार्ट वाल्व को ही सुरक्षित माना।
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इच्छामृत्यु पाने वाले हरीश पहले इंसान
बता दें कि 13 साल से कोमा पीड़ित हरीश की 24 मार्च की शाम करीब 4 बजे एम्स दिल्ली में मृत्यु हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने हरीश को 11 मार्च को इच्छामृत्यु की इजाजत दी थी। यह देश का पहला मामला है, जिसमें किसी को इच्छामृत्यु मिली है।
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13 सालों में हरीश की हालत बहुत ही दर्दनाक थी
इन 13 सालों में हरीश की हालत बहुत ही दर्दनाक थी। परिवार के लिए उन्हें ऐसे देखना मानसिक रूप से बेहद कठिन था। वह वेंटिलेटर, दवाइयों, नर्सिंग और देखभाल पर परिवार लाखों रुपेए खर्च कर चुका था। तभी मजबूर होकर 3 अप्रैल, 2024 को दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इच्छामृत्यु की इजाजत मांगी थी।
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हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे
दिल्ली में जन्मे और चंडीगढ़ की पंजाब यू्निवर्सिटी से बीटेक की पढ़ाई कर हरीश 2013 में वह हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे। इसकी वजह से उनके पूरे शरीर में लकवा मार गया और वह कोमा में चले गए थे। वह न कुछ बोल सकते थे और न ही महसूस कर सकते थे। सिर्फ सांसे चल रही थीं।
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