जन्म के वक्त स्वस्थ, एक बुखार और उजड़ गई जिंदगी, गाजीपुर के गांवों में डराने वाली बीमारी

Published : Jan 17, 2026, 03:14 PM IST

गाजीपुर के करीब 12 गांवों में रहस्यमयी बीमारी से सैकड़ों बच्चे दिव्यांग हो रहे हैं। जन्म के समय स्वस्थ रहने वाले बच्चों को तेज बुखार के बाद मानसिक और शारीरिक दिव्यांगता हो रही है। मामला राज्यपाल तक पहुंचा, जांच के निर्देश दिए गए हैं।

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जन्म के बाद सब ठीक, फिर एक बुखार और उजड़ती जिंदगी

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले से एक ऐसी रहस्यमयी और डराने वाली तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है। यहां दर्जन भर गांवों में बच्चे जन्म के वक्त पूरी तरह स्वस्थ होते हैं, लेकिन कुछ महीनों या सालों बाद एक तेज बुखार उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल देता है। बुखार के बाद ये बच्चे धीरे-धीरे शारीरिक और मानसिक रूप से दिव्यांग हो जाते हैं और परिवार आजीवन देखभाल के बोझ तले दब जाता है।

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एक-दो नहीं, करीब 12 गांव इस संकट की चपेट में

फतेहुल्लापुर, बहादीपुर, हरिहरपुर, हाला, छोटी जंगीपुर समेत गाजीपुर के लगभग 12 गांवों में यह स्थिति लगातार सामने आ रही है। गांव वालों के मुताबिक, बच्चा सामान्य तरीके से पैदा होता है, कुछ समय तक सब ठीक रहता है, फिर अचानक तेज बुखार आता है और उसके बाद बच्चे का विकास रुक जाता है। धीरे-धीरे वह मानसिक और शारीरिक रूप से पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाता है।

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इलाज पर लाखों खर्च, लेकिन बीमारी का नाम तक नहीं

हरिहरपुर गांव की एक कहानी पूरे हालात को बयान कर देती है। यहां एक परिवार की दो बेटियों को जन्म के कुछ महीनों बाद तेज बुखार आया। इसके बाद दोनों की मानसिक स्थिति बिगड़ती चली गई। माता-पिता ने इलाज में अपनी जमा-पूंजी तक झोंक दी, लेकिन न तो बच्चियां ठीक हुईं और न ही डॉक्टर यह स्पष्ट कर पाए कि आखिर बीमारी है क्या। परिवार की आर्थिक हालत इतनी खराब हो चुकी है कि पिता को गुजरात में मजदूरी करनी पड़ रही है और वह लंबे समय से घर भी नहीं आ पाए हैं।

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सैकड़ों बच्चे जिंदगी भर के लिए दिव्यांग

यह समस्या किसी एक गांव या एक परिवार तक सीमित नहीं है। फतेहुल्लापुर, हरिहरपुर, पठानपुर, हाला, शिकारपुर, धरी कला, अगस्ता, भोरहा, भिक्केपुर, तारडीह, गोला और रठूली जैसे कई गांवों में हर गांव से 8 से 10 बच्चे इस बीमारी का शिकार बताए जा रहे हैं। कहीं 6 महीने का बच्चा प्रभावित हुआ, तो कहीं एक-दो साल बाद लक्षण दिखे। कुछ मामलों में 4–5 साल बाद भी बीमारी सामने आई।

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जंजीरों और रस्सियों में बंधा बचपन

परिजनों का दर्द यहीं खत्म नहीं होता। कई बच्चे इतने असहज हो जाते हैं कि न तो अपनी दिनचर्या संभाल पाते हैं और न ही खुद को सुरक्षित रख सकते हैं। मजबूरी में कुछ परिवारों को बच्चों को रस्सियों या जंजीरों से बांधकर रखना पड़ता है, ताकि वे भटक न जाएं या खुद को नुकसान न पहुंचा दें। यह दृश्य इंसानियत को झकझोर देने वाला है।

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