
गाजियाबाद के साहिबाबाद में रहने वाले हरीश राणा की कहानी ने पूरे देश को भावुक कर दिया है। करीब 13 साल तक बिस्तर पर दर्द भरी जिंदगी जीने के बाद अब उन्हें अंतिम विदाई दी गई। परिजन और जानने वाले लोग नम आंखों से उन्हें याद कर रहे हैं। साहिबाबाद के मोहन नगर स्थित ब्रह्मकुमारी केंद्र से बहन कुमारी लवली दीदी भी हरीश के घर पहुंचीं और उन्हें आध्यात्मिक तरीके से अंतिम विदाई दी।
मोहन नगर स्थित Brahma Kumaris केंद्र के प्रभु मिलन भवन से जुड़ी बहन कुमारी लवली दीदी 13 मार्च को हरीश के घर पहुंचीं। उन्होंने सबसे पहले हरीश के माथे पर चंदन का तिलक लगाया और शांत मन से अंतिम विदाई दी। इस दौरान उन्होंने कहा कि “सबको माफ करते हुए और सबसे माफी मांगते हुए सो जाओ।” उन्होंने हरीश की आत्मा की शांति के लिए मेडिटेशन भी किया और परिवार को ढांढस बंधाया।
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हरीश की मां निर्मला देवी बेटे को याद करते हुए कई बार भावुक हो गईं। उन्होंने बताया कि बचपन में हरीश बहुत शरारती था। वह कहती हैं, “मैं उसे डांटती थी तो वह किसी कोने में जाकर छिप जाता था। थोड़ी देर बाद फिर चुपचाप आकर मेरे गले लग जाता और मेरे चेहरे को सहलाने लगता।” निर्मला देवी के मुताबिक हरीश उनका पहला बच्चा था, इसलिए घर में उसे सबसे ज्यादा प्यार मिला।
परिवार के अनुसार हरीश का जन्म 12 सितंबर 1993 को दिल्ली में हुआ था। जुलाई 2010 में उन्होंने चंडीगढ़ की Chandigarh University में सिविल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया था। साल 2013 में वह अंतिम वर्ष के छात्र थे। अगस्त 2013 में रक्षाबंधन के दिन अपनी बहन से फोन पर बात करते हुए वह पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए। गंभीर हालत में उन्हें Postgraduate Institute of Medical Education and Research में भर्ती कराया गया।
बाद में दिसंबर 2013 में उन्हें दिल्ली के Lok Nayak Jai Prakash Narayan Hospital में भर्ती कराया गया। यहां डॉक्टरों ने बताया कि हरीश क्वाड्रिप्लेजिया से पीड़ित हैं। इस बीमारी के कारण उनके हाथ-पैर पूरी तरह काम करना बंद कर चुके थे और वह पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो गए थे। इसके बाद से पिछले 13 साल तक उनका जीवन बिस्तर तक सीमित रह गया।
हरीश की लगातार बढ़ती पीड़ा और शारीरिक अक्षमता को देखते हुए उनके माता-पिता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने इच्छामृत्यु की अनुमति देने के लिए Delhi High Court में याचिका दायर की। हालांकि 8 जुलाई 2025 को हाईकोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया। इसके बाद परिवार ने मामला Supreme Court of India में पहुंचाया।
करीब आठ महीने तक चली सुनवाई के बाद 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी। यह फैसला परिवार के लिए बेहद भावुक पल था। एक तरफ उन्हें बेटे के लंबे दर्द से मुक्ति मिलने का एहसास था, तो दूसरी तरफ उसे हमेशा के लिए खो देने का दुख भी। हरीश राणा की कहानी अब लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि लंबे समय तक गंभीर बीमारी और असहनीय पीड़ा झेल रहे मरीजों के लिए इच्छामृत्यु का मुद्दा कितना संवेदनशील और जटिल है।
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