Bengal Politics Analysis: TMC के 'खेला' का अंत? संदेशखाली-डॉक्टरों के गुस्से ने कैसे बदली बंगाल की हवा

Published : May 11, 2026, 09:29 AM IST
Bengal Politics Analysis: TMC के 'खेला' का अंत? संदेशखाली-डॉक्टरों के गुस्से ने कैसे बदली बंगाल की हवा

सार

बंगाल दशकों के कुशासन, विशेषकर TMC की हिंसा और गुंडागर्दी से त्रस्त रहा है। संदेशखाली जैसी घटनाओं ने जनता को जगाया। इन चुनौतियों के बावजूद, बीजेपी ने आतंक का सामना कर महत्वपूर्ण चुनावी जीत हासिल की है।

एक ज़माना था जब कहा जाता था, 'बंगाल जो आज सोचता है, भारत वो कल सोचता है।' ये बात आज़ादी से पहले बंगाल की सांस्कृतिक और बौद्धिक ताकत को दिखाती है। और हो भी क्यों न? रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरबिंदो, रवींद्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस, रास बिहारी बोस, परमहंस योगानंद, जगदीश चंद्र बोस, श्यामाप्रसाद मुखर्जी…बंगाल की महान हस्तियों की ये लिस्ट बहुत लंबी है।

भारत की आज़ादी की लड़ाई का सेंटर भी बंगाल ही था। अंग्रेज़ों को भारत छोड़ने पर मजबूर करने में बंगाल की मिट्टी के सपूत सुभाष चंद्र बोस ने एक निर्णायक भूमिका निभाई। लेकिन आज़ादी के बाद बंगाल की किस्मत उल्टी दिशा में चलने लगी। हालात ऐसे हो गए कि अब पूछना पड़ता है, 'भारत जो आज हासिल कर रहा है, क्या बंगाल उसे कल-परसों भी हासिल कर पाएगा?'

कुशासन से बेहाल बंगाल

बंगाल के लोगों के बारे में सोचकर दुख होता है। आज़ादी के बाद पूरे 30 साल कांग्रेस (INC और बंगाली कांग्रेस) को झेलने के बाद, 34 साल तक कम्युनिस्टों के चंगुल में फंसे रहे। और आखिर में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) को सत्ता सौंपकर बंगाल के लोग आसमान से गिरे, खजूर में अटके वाली हालत में पहुंच गए। ममता 2011 में कम्युनिस्टों की हिंसा और तुष्टिकरण की राजनीति का विरोध करके ही सत्ता में आई थीं, लेकिन बाद में उन्होंने खुद वही रास्ता अपना लिया।

भारत के बाकी राज्यों में चुनाव सरकार के काम, घोषणापत्र और विकास जैसे मुद्दों पर होते हैं, लेकिन बंगाल में ऐसा माहौल ही नहीं है। वहां TMC के लोग वोट मांगते नहीं, बल्कि धमकाते हैं कि अगर वोट नहीं दिया तो देख लेंगे। कम्युनिस्ट शासन में केरल और त्रिपुरा में भी यही हाल था। त्रिपुरा में बीजेपी सरकार आने के बाद हालात बदले। केरल में भी 2017 में बीजेपी की 'जनसुरक्षा यात्रा' के बाद हिंसा कुछ कम हुई। सोशल मीडिया के ज़माने में हिंसा छिपाना आसान नहीं है, ये शर्म शायद केरल के कम्युनिस्टों को आ गई। लेकिन ममता बनर्जी को किसी बात की परवाह नहीं थी। ऐसे राज्य में बदलाव लाना आसान नहीं था, पर वक्त हर चीज़ का हिसाब करता है।

चुनौतियों के बीच बीजेपी का सफर

34 साल के कम्युनिस्ट कुशासन का अंत नंदीग्राम में ममता के आंदोलन से हुआ था। तब बीजेपी उनके साथ खड़ी थी। NDA के साथ उनके रिश्ते ने कम्युनिस्टों के खिलाफ लड़ाई में ईंधन का काम किया। लेकिन सत्ता में आने के बाद ममता ने उसी बीजेपी को खत्म करने की कोशिश की। बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्याएं और उनके घर की महिलाओं के साथ बदसलूकी का सिलसिला चलता रहा। 2014 के लोकसभा चुनाव में देश भर में मोदी लहर के बावजूद, बंगाल में बीजेपी को सिर्फ 2 सीटें मिलीं। लेकिन 2019 तक बंगाल का एक बड़ा बौद्धिक वर्ग बीजेपी की तरफ आ गया, जिसका नतीजा 18 सीटों के रूप में मिला। 2021 के विधानसभा चुनाव तक, कभी ममता के दाहिने हाथ रहे सुवेंदु अधिकारी भी बीजेपी में आ गए। तब मुकाबला और कड़ा हो गया। TMC गुंडों की भारी हिंसा के बावजूद बीजेपी ने 77 सीटें जीतीं।

बीजेपी की टक्कर से बौखलाई ममता ने एक चुनावी रैली में खुलेआम कहा था, 'केंद्रीय सुरक्षा बलों के भरोसे ज़्यादा मत उछलो। उनके जाने के बाद 'खेला होबे'।' नतीजे आने के बाद TMC के गुंडों ने उनकी बात को सच कर दिखाया। बीजेपी कार्यकर्ताओं का खून बहा, 300 से ज़्यादा जानें गईं। महिलाओं से बलात्कार हुए और घर जला दिए गए। 2024 के लोकसभा चुनाव में डर का माहौल ऐसा था कि कई बूथों पर बीजेपी को एजेंट तक नहीं मिले, जिसका नतीजा ये हुआ कि बीजेपी 6 सीटें हारकर 12 पर आ गई।

बंगाल को जगाने वाली घटनाएं

2024 में कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में एक लड़की के साथ रेप और हत्या हुई। प्रिंसिपल और स्थानीय पुलिस ने इसे आत्महत्या बताने की कोशिश की। इसके खिलाफ डॉक्टरों ने करीब 42 दिनों तक ज़बरदस्त विरोध प्रदर्शन किया। इस घटना ने बंगाल की अंतरात्मा को झकझोर दिया। यहीं से ममता के कुशासन के अंत की शुरुआत हुई। बीजेपी ने इस बार उस लड़की की मां, रत्ना देबनाथ को टिकट दिया। जब वो वोट मांगने जातीं, तो महिलाएं उन्हें गले लगाकर रोतीं और कहतीं कि हम आपके साथ हैं। अब रत्ना चुनाव जीतकर विधायक बन गई हैं।

दूसरा मामला जिसने पूरे देश में सुर्खियां बटोरीं, वो था संदेशखाली का। जब ED की टीम राशन घोटाले के आरोप में TMC नेता शेख शाहजहान के दफ्तर पर छापा मारने गई, तो TMC के गुंडों ने अधिकारियों पर जानलेवा हमला कर दिया। यही शाहजहान और उसका गैंग गांव की महिलाओं को पार्टी ऑफिस में बुलाकर उनके साथ रेप करता था। गांव के किसानों की ज़मीन पर खारा पानी डालकर उसे बंजर बनाया जाता था और फिर उस पर कब्ज़ा कर लिया जाता था। जब लोगों के सब्र का बांध टूटा, तो इस विरोध की अगुवाई एक दिलेर महिला रेखा पात्रा ने की। वो भी अब विधायक बन चुकी हैं। शाहजहान फिलहाल जेल में है।

इन दो घटनाओं के साथ-साथ, पड़ोसी देश बांग्लादेश में हो रही हिंदुओं की हत्या और पलायन ने भी बंगाल के लोगों को जगा दिया। हिम्मत करके खड़े होने के बावजूद, TMC के गुंडों से लड़ने के लिए एक कंधे की ज़रूरत थी, और बीजेपी वो कंधा बनी। अलग-अलग केसों में जेल में बंद कार्यकर्ताओं को बाहर निकाला गया और उनके परिवारों को हिम्मत दी गई। केंद्रीय सुरक्षा बलों ने TMC के आतंक पर ब्रेक लगाया और लोगों के लिए बिना डरे वोट डालने का माहौल बनाया।

जीत के पीछे एक कन्नड़िगा का परिश्रम

आज बीजेपी जीत चुकी है। श्यामाप्रसाद मुखर्जी का सपना भी साकार हुआ है। बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बी.एल. संतोष ने कहा था, 'बंगाल हमारे लिए राजनीतिक युद्ध नहीं, बल्कि सभ्यता का युद्ध है। बंगाल की जीत में ही भारत की जीत है।' बीजेपी ने सभ्यता की ये लड़ाई जीत ली है। खुशी की बात ये है कि सभ्यता की रक्षा की इस लड़ाई में हमारे कर्नाटक के मूडिगेरे के एक नौजवान अरुण बिन्नडी ने भी अहम भूमिका निभाई। नॉर्थ ज़ोन सिलीगुड़ी डिवीजन के संगठन महामंत्री के तौर पर काम करते हुए अरुण ने 28 में से 26 सीटों पर जीत दिलाई। उनसे बात करने पर समझ आता है कि ये काम कितना मुश्किल था। TMC के गुंडे बूथ स्तर की बैठकें तक नहीं करने देते थे। ऐसी जगहों पर उनके सामने डटकर यह जीत हासिल की गई है। इस मेहनत से मिली बीजेपी की जीत 'सोनार बांग्ला' के उदय की शुरुआत करे, यही कामना है।

- राकेश शेट्टी, लेखक

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