
US India Trade Deficit: डोनाल्ड ट्रंप की सख्त व्यापार नीतियां और 100% टैरिफ (Tariff) लगाने की धमकियां इस वक्त ग्लोबल पॉलिटिक्स और इकॉनमी में हॉट टॉपिक बनी हुई हैं। अमेरिका को सबसे ज्यादा दिक्कत इस बात से है कि भारत रूस से डिस्काउंट रेट पर तेल खरीद रहा है। फिलहाल भारत अपनी जरूरत का 50% तेल अकेले रूस से मंगाता है, और अमेरिका चाहता है कि इसे तुरंत रोका जाए। इस टेंशन के बीच, अमेरिकी टैरिफ के झटके से अपनी इकॉनमी को बचाने के लिए भारत के '7 मास्टरप्लान' सोशल मीडिया और आर्थिक गलियारों में खूब वायरल हो रहे हैं।
ट्रंप का असली मकसद भारत से एक ऐसी ट्रेड डील क्रैक करना है जो अमेरिका के फेवर में हो। अगर भारत अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौता कर लेता है, तो भारतीय सामानों पर 100% टैरिफ की छूट मिल सकती है। लेकिन पेंच यह है कि इस डील के बहाने अमेरिका अपने डेयरी और कृषि उत्पादों को भारतीय बाजार में डंप करना चाहता है। ऐसे में अपने किसानों के हितों को देखते हुए भारत को बहुत फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा।
अमेरिकी टैरिफ के खतरे को तुरंत टालने का एक तरीका यह है कि रूस से तेल का आयात कम कर दिया जाए। ट्रंप की डिमांड है कि भारत रूस को छोड़कर अमेरिका, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका से ज्यादा कच्चा तेल खरीदे। वैसे तो भारत पहले से ही 42 से ज्यादा देशों से तेल खरीद रहा है, लेकिन अगर रूस को पूरी तरह से छोड़ दिया, तो भारत का फ्यूल बिल आसमान छूने लगेगा और देश में महंगाई बढ़ने का बड़ा खतरा है।
जेनेरिक दवाएं, इलेक्ट्रॉनिक्स और जरूरी उपकरणों के एक्सपोर्ट में भारत दुनिया में सबसे आगे है। खुद अमेरिकियों को भी भारत की सस्ती दवाओं की सख्त जरूरत है। ऐसे में कूटनीति का इस्तेमाल करके इन खास सेक्टर्स में टैरिफ से छूट मांगना भारत की तीसरी बड़ी स्ट्रैटेजी है।
एप्पल (Apple) जैसी ग्लोबल दिग्गज कंपनियां भारत में अपना प्रोडक्शन बढ़ाकर अमेरिका को सप्लाई कर सकें, इसके लिए इन्वेस्टमेंट के नियमों को आसान बनाना एक और रास्ता है। लेकिन दिक्कत यह है कि ट्रंप खुद अमेरिकी कंपनियों के विदेश में निवेश करने के खिलाफ हैं, इसलिए इस रास्ते पर चलना भारत के लिए इतना आसान नहीं होगा।
इस वक्त अमेरिका का भारत के साथ लगभग $90 बिलियन का ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) है। इसे बैलेंस करने के लिए भारत अमेरिका से एलएनजी (LNG), कच्चा तेल, बोइंग (Boeing) विमान, रक्षा हथियार और मशीनरी का आयात बढ़ा सकता है। इससे ट्रंप का गुस्सा थोड़ा शांत हो सकता है और टैरिफ का बोझ कम होने के चांस हैं।
सिर्फ अमेरिका के भरोसे न बैठकर यूरोपियन यूनियन (EU), यूके (UK), कनाडा और एशियाई देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) का दायरा बढ़ाना भारत का एक दूरदर्शी कदम है। चूंकि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है, इसलिए रातों-रात उसका विकल्प खोजना मुश्किल है, लेकिन लंबे समय के लिए यह सबसे सेफ मास्टरप्लान है।
अमेरिका के एकतरफा और गैर-जरूरी टैरिफ के खिलाफ WTO का दरवाजा खटखटाना भारत के पास एक लीगल ऑप्शन है। लेकिन WTO की कानूनी प्रक्रिया बहुत धीमी है, इसलिए इससे तुरंत कोई आर्थिक राहत नहीं मिलेगी। इस पर अभी वेट एंड वॉच करना होगा।
अमेरिका का 'टैरिफ शॉक' चाहे कितना भी तगड़ा क्यों न हो, भारत अपनी कूटनीतिक समझदारी, आयात-निर्यात के डायवर्सिफिकेशन और स्मार्ट आर्थिक रणनीतियों के जरिए इस चुनौती से निपटने की पूरी तैयारी कर रहा है। इन सातों रास्तों का सही बैलेंस बनाकर चलना ही भारत के लिए असली मास्टरप्लान साबित होगा।
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