Right To Die: इच्छामृत्यु की 4 कहानियां जो दिल दहला देंगी-जीवन और मौत के बीच फंसे परिवार हो रहे तबाह

Published : Mar 13, 2026, 10:55 AM IST

भारत में इच्छामृत्यु की 4 सच्ची कहानियां देश को झकझोर रही हैं-30 साल से गरिमापूर्ण मृत्यु मांगती बुजुर्ग महिला, 5 साल से कोमा में डॉक्टर, ब्रेन डेड बेटी पर उम्मीद और बीमार बच्चों से जूझता परिवार। क्या भारत में Mercy Killing का कानून अब भी अधूरा है?

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Mercy Killing India: यूपी के गाजियाबाद के हरीश राणा की इच्छामृत्यु की अपील सुप्रीम कोर्ट के स्वीकार करने के बाद से  भारत में इच्छामृत्यु (Euthanasia) या लाइलाज और दर्द की बीमारी से पीड़ित एक रोगी की हत्या (Mercy Killing) को लेकर नई बहस छिड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को अनुमति दी है, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी स्पष्ट नियम और सुविधाएं कई जगहों पर नहीं हैं। इसी वजह से देश के अलग-अलग राज्यों से ऐसी कहानियां सामने आती रहती हैं, जहां गंभीर बीमारी, कोमा या आर्थिक संकट से जूझ रहे परिवार “गरिमापूर्ण मृत्यु” के अधिकार की मांग करते हैं। कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और केरल से सामने आई चार सच्ची कहानियां इस बहस को और गहरा कर देती हैं। ये केवल कानून का मुद्दा नहीं हैं, बल्कि मानव पीड़ा, उम्मीद और संघर्ष की कहानी भी हैं।

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क्या 30 साल से गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार के लिए लड़ रही हैं करिबासम्मा?

कर्नाटक के दावनगेरे की 86 वर्षीय पूर्व शिक्षिका एचबी करिबासम्मा पिछले तीन दशकों से गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार की लड़ाई लड़ रही हैं। 1996 में उन्हें स्लिप डिस्क की गंभीर समस्या हुई, जिससे असहनीय दर्द शुरू हो गया। इसके बाद 1998 में उन्होंने कर्नाटक हाई कोर्ट में याचिका दायर की और इच्छामृत्यु के मुद्दे को कानूनी बहस का हिस्सा बनाया। आज करिबासम्मा कैंसर से भी जूझ रही हैं और बेंगलुरु के एक ओल्ड एज होम में रह रही हैं। उनका कहना है कि गरिमापूर्ण मृत्यु केवल मरीज के लिए नहीं, बल्कि उसकी सेवा करने वालों की गरिमा के लिए भी जरूरी है। उनका मानना है कि सरकार को गरीब मरीजों के लिए स्पष्ट और पारदर्शी प्रक्रिया बनानी चाहिए।

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मध्य प्रदेश में 5 साल से कोमा में डॉक्टर बेटा-परिवार की दर्दनाक लड़ाई

मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के होम्योपैथिक डॉक्टर हरीश गोले पिछले पांच साल से कोमा में हैं। 2 मार्च 2021 को क्लिनिक जाते समय सड़क दुर्घटना में उनके सिर और रीढ़ में गंभीर चोटें आई थीं। लंबे इलाज और कई सर्जरी के बावजूद वे होश में नहीं आ सके। तब से 46 वर्षीय हरीश घर के बिस्तर पर हैं और उनके बुजुर्ग माता-पिता ही उनकी देखभाल कर रहे हैं। पिता रोज उन्हें करवट दिलाते हैं, मालिश करते हैं और ट्यूब के जरिए दूध, जूस और दवाएं देते हैं। इलाज और रोजमर्रा के खर्चों ने परिवार को आर्थिक संकट में डाल दिया है और करीब 20 लाख रुपये का कर्ज हो चुका है।

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महाराष्ट्र की श्रेया-ब्रेन डेड होने के बाद भी परिवार ने नहीं छोड़ी उम्मीद

महाराष्ट्र के गड़चिरौली की 28 वर्षीय श्रेया का सपना सॉफ्टवेयर डेवलपर बनने का था। उन्होंने पुणे के डीवाई पाटील कॉलेज से एमसीए किया और पढ़ाई में टॉप भी किया। लेकिन 3 फरवरी 2022 की रात एक सड़क दुर्घटना ने उनकी जिंदगी बदल दी। दुर्घटना में उनके मस्तिष्क को गंभीर चोट लगी और डॉक्टरों ने उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया। पिछले चार वर्षों से श्रेया बिस्तर पर हैं। उनका चेहरा हमेशा एक जैसा रहता है और डॉक्टर भी यह नहीं कह पा रहे कि वह कभी सामान्य हो पाएंगी या नहीं। फिर भी उनके माता-पिता उम्मीद नहीं छोड़ पाए हैं। इसी वजह से उन्होंने अब तक इच्छामृत्यु की मांग नहीं की।

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केरल का परिवार सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंचा?

केरल के कोट्टायम जिले में रहने वाले स्मिता एंटनी और मनु जोसेफ की जिंदगी भी मुश्किलों से घिरी हुई है। उनके दो बच्चों को लवण-क्षयकारी जन्मजात अधिवृक्क अतिवृद्धि (Salt-Wasting Congenital Adrenal Hyperplasia) नाम की दुर्लभ बीमारी है। इस बीमारी में बच्चों को लगातार दवाओं और निगरानी की जरूरत होती है। इसके अलावा एक बच्चे को गंभीर ऑटिज्म भी है, जिससे देखभाल और कठिन हो जाती है। बच्चों की देखभाल के लिए माता-पिता को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी। आमदनी बंद हो गई और इलाज का खर्च बढ़ता गया। परिवार ने संपत्ति बेच दी, घर गिरवी रख दिया और कर्ज लेना पड़ा। 2024 में इस दंपती ने सुप्रीम कोर्ट से पूरे परिवार के लिए मर्सी किलिंग की अनुमति मांगने की बात कही थी। बाद में प्रशासन सक्रिय हुआ और कुछ आर्थिक मदद भी दी गई।

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क्या भारत में इच्छामृत्यु कानून अभी भी अधूरा है?

इन चार कहानियों से एक बड़ा सवाल सामने आता है- क्या भारत में गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को वास्तव में गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार मिल पा रहा है? कानून मौजूद होने के बावजूद प्रक्रिया जटिल है और कई मामलों में गरीब परिवारों को स्पष्ट मार्गदर्शन नहीं मिलता। यही वजह है कि इच्छामृत्यु का मुद्दा आज भी कानून, नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं के बीच एक कठिन बहस बना हुआ है।

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