
केंद्र सरकार ने देश में छिपे हुए तेल और प्राकृतिक गैस के भंडारों को खोजने के लिए एक नया कदम उठाया है। इसके लिए, पुराने जियोलॉजिकल डेटा को अत्याधुनिक तकनीक की मदद से फिर से परखा जाएगा। यह फैसला देश में तेल की खोज में तेजी लाने के लिए किया गया है। योजना के तहत पुराने सीस्मिक डेटा का दोबारा विश्लेषण किया जाएगा और देश के अलग-अलग हिस्सों में नए 3D सीस्मिक सर्वे भी होंगे। इस पूरी कवायद का मकसद ऊर्जा के क्षेत्र में देश की सुरक्षा पक्की करना और आयात पर निर्भरता घटाना है। पेट्रोलियम मंत्रालय की तकनीकी शाखा, डायरेक्टरेट जनरल ऑफ हाइड्रोकार्बन्स (DGH), इन सभी गतिविधियों को कोऑर्डिनेट कर रही है।
इसे आसान भाषा में ऐसे समझ सकते हैं कि एक्सपर्ट्स दशकों पुराने भूगर्भीय डेटा को आज की मॉडर्न इमेजिंग तकनीकों से दोबारा जांचेंगे। उम्मीद है कि इस नई जांच से तेल और गैस के ऐसे भंडार मिल सकते हैं, जो पुराने सर्वे में पकड़ में नहीं आए थे। सीस्मिक सर्वे की तुलना मेडिकल स्कैनिंग से की जा सकती है। इसमें ध्वनि तरंगों को जमीन के नीचे भेजा जाता है और उनके वापस लौटने के आधार पर यह पता लगाया जाता है कि धरती के नीचे क्या है। तेल कंपनियां इसी तरह के सर्वे के आधार पर फैसला करती हैं कि कहां खुदाई करनी है। अधिकारियों का मानना है कि पुराने तरीकों के मुकाबले, आज के सुपर-कंप्यूटिंग सिस्टम और मॉडर्न डेटा प्रोसेसिंग से कहीं ज्यादा साफ और सटीक जानकारी मिलेगी।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार भारत के पूर्वी तट पर हजारों किलोमीटर में फैले एक बड़े समुद्री खोज सर्वे की योजना बना रही है। यह विशाल भूगर्भीय सर्वे पूर्णिया बेसिन, महानदी बेसिन, कृष्णा गोदावरी बेसिन, कावेरी बेसिन और अंडमान (ईस्ट) बेसिन में किया जाएगा। सरकार इस काम के लिए विशेष सर्वे कंपनियों को नियुक्त करेगी, जो यह पता लगाएंगी कि समुद्र के नीचे व्यावसायिक तौर पर निकाले जाने लायक तेल या प्राकृतिक गैस है या नहीं।
भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। जब भी दुनिया में युद्ध या कोई संकट होता है, तो तेल की बढ़ती कीमतें देश के लिए एक बड़ा झटका होती हैं। इसी स्थिति से बचने के लिए सरकार अपने ही देश में तेल की खोज और उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रही है। सरकार का मौजूदा प्रयास भविष्य में और ज्यादा जगहों पर खोज शुरू करने से पहले, जमीन के नीचे मौजूद भंडारों की एक साफ तस्वीर तैयार करना है।
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