
Indore Ghost Hospital: क्या आपने कभी किसी ऐसे अस्पताल के बारे में सुना है जहां आलीशान पद हैं, डॉक्टरों और नर्सों की नियुक्तियां होती हैं, बकायदा ट्रांसफर ऑर्डर भी जारी किए जाते हैं, लेकिन हकीकत में उस अस्पताल की एक भी ईंट अस्तित्व में नहीं है? मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर से एक ऐसा ही हैरतअंगेज और प्रशासनिक लापरवाही से भरा मामला सामने आया है। यह कहानी है इंदौर के खजराना सिविल हॉस्पिटल की, जो पिछले छह सालों से सिर्फ और सिर्फ सरकारी फाइलों और पोर्टल्स पर 'ज़िंदा' है, जबकि ज़मीन पर इसका कोई नामोनिशान तक नहीं है।
इस भूतिया अस्पताल का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि यह आज भी सरकारी कागज़ात में पूरी तरह एक्टिव है। अभी हाल ही में, 15 जून, 2026 को स्वास्थ्य विभाग द्वारा एक आधिकारिक पोस्टिंग ऑर्डर जारी किया गया। इस ऑर्डर के तहत एक लैब टेक्नीशियन का तबादला सीधे 'खजराना सिविल हॉस्पिटल' के लिए कर दिया गया। मज़ेदार बात यह है कि जिस अस्पताल में इस कर्मचारी को भेजा गया, वहां आज तक न तो कोई इमारत बनी है और न ही कभी कोई मरीज भर्ती हुआ है। इस अजीबोगरीब ट्रांसफर ने सिस्टम की पोल खोलकर रख दी है।
इस पूरी कहानी की शुरुआत 23 जून, 2020 को हुई थी, जब मध्य प्रदेश सरकार ने इंदौर के बेहद घनी आबादी वाले खजराना इलाके के लिए 100 बिस्तरों वाले एक सिविल अस्पताल को मंजूरी दी थी। इस प्रोजेक्ट का मकसद खजराना, मूसाखेड़ी, तेजाजी नगर और बिचोली हप्सी जैसे क्षेत्रों के करीब तीन लाख से अधिक लोगों को सीधे स्वास्थ्य लाभ पहुंचाना था। साथ ही, इससे शहर के बड़े अस्पतालों जैसे MY, MTH और जिला अस्पताल पर मरीजों का बोझ कम होना था। मंजूरी के साथ ही सरकार ने इस अस्पताल के लिए 87 सरकारी पदों को भी हरी झंडी दे दी। इन पदों में स्पेशलिस्ट डॉक्टर, मेडिकल ऑफिसर, स्टाफ नर्स, फार्मासिस्ट और लैब टेक्नीशियन शामिल थे। लेकिन छह साल बीत जाने के बाद भी यह अस्पताल फाइलों से बाहर नहीं निकल सका क्योंकि स्वास्थ्य विभाग इसके लिए जमीन ही अलॉट नहीं करवा पाया।
Indore, Madhya Pradesh: On the approval of posts for the hospital, Congress leader Sajjan Singh Verma says, "I am not in a position to tell you about the medical staff. Some staff have been established, who have been transferred from other districts....'' pic.twitter.com/F9UD5uaob2
— IANS (@ians_india) July 3, 2026
बिना बिल्डिंग के इन 87 कर्मचारियों का क्या हो रहा है? इसका जवाब भी बेहद दिलचस्प है। दरअसल, यह पूरा अमला विभागीय पोर्टल्स पर इसी 'घोस्ट हॉस्पिटल' का हिस्सा दिखता है। लेकिन हकीकत में इन कर्मचारियों को इंदौर के पीसी सेठी हॉस्पिटल, हुकुमचंद हॉस्पिटल और विभिन्न संजीवनी क्लीनिकों से अटैच किया गया है। कागज़ात में ये खजराना अस्पताल के कर्मचारी हैं, लेकिन असलियत में इस अस्पताल का न कोई वॉर्ड है, न बिस्तर और न ही कोई तय पता। इस प्रशासनिक विफलता का सीधा खामियाजा स्थानीय जनता भुगत रही है, जिन्हें आज भी इलाज के लिए शहर के दूरदराज़ और भीड़भाड़ वाले अस्पतालों के चक्कर काटने पड़ते हैं।
इस अजीबोगरीब मामले पर जब राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट बढ़ी, तो सरकार की तरफ से भी बयान सामने आए। सूबे के डिप्टी सीएम और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला ने माना कि समय के साथ इस प्रस्ताव में बदलाव हुए। उन्होंने कहा, "पहले यह एक शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र था, जिसे बाद में 50 बिस्तरों के अस्पताल में अपग्रेड किया गया। मंजूर पद विभागीय पोर्टल पर दिख रहे हैं और स्टाफ को दूसरी जगहों पर एडजस्ट किया गया है। हम जमीन की तलाश कर रहे हैं।" वहीं, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. माधव हसानी ने भी पैरवी करते हुए कहा कि शहरी इलाकों में जमीन का अधिग्रहण एक बेहद मुश्किल और समय लेने वाला काम है, जिसके चलते अभी तक जमीन का कब्जा नहीं लिया जा सका है और डेटा अपडेट होना बाकी है।
इस सनसनीखेज खुलासे के बाद प्रदेश की सियासत पूरी तरह गरमा गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने इसे एक बड़ा घोटाला करार देते हुए उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। उन्होंने तीखा हमला बोलते हुए कहा, "यह बेहद अजीब और हास्यास्पद स्थिति है कि ज़मीन पर कोई अस्पताल ही नहीं है, फिर भी वहां नियुक्तियां और ट्रांसफर हो रहे हैं। कांग्रेस आगामी विधानसभा सत्र में इस मुद्दे को ज़ोर-शोर से उठाएगी।"
दूसरी तरफ, खजराना अस्पताल संघर्ष समिति के अध्यक्ष अरशद मिर्ज़ा बेग ने एक बेहद गंभीर आरोप लगाया है। उनका कहना है कि अस्पताल के लिए ज़मीन तो उपलब्ध है, लेकिन विभाग जानबूझकर बहाने बना रहा है क्योंकि उस कीमती सरकारी जमीन पर भू-माफियाओं का अवैध कब्जा है। अब देखना यह है कि क्या साल 2026 में उजागर हुआ यह 'घोस्ट हॉस्पिटल' कभी असलियत की ज़मीन पर उतर पाएगा या फिर कागज़ों पर ही डॉक्टरों के तबादलों का यह खौफनाक खेल चलता रहेगा?
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