
मध्यपूर्व की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां शब्दों की धार मिसाइलों से कम नहीं मानी जा रही। ईरान के सत्ता गलियारों से आया एक बयान न सिर्फ क्षेत्रीय समीकरण बदलने का संकेत देता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि परमाणु कार्यक्रम और सामरिक शक्ति को लेकर तेहरान अब किसी समझौते के मूड में नहीं है।
मुज्ताबा खामनेई ने अपने ताजा बयान में साफ कहा कि ईरान के लिए उसकी तकनीकी और सैन्य क्षमताएं, खासतौर पर न्यूक्लियर और मिसाइल कार्यक्रम, राष्ट्रीय पूंजी हैं। उन्होंने इसे केवल रणनीतिक ताकत नहीं, बल्कि देश की पहचान, आत्मनिर्भरता और सुरक्षा का आधार बताया। उन्होंने कहा कि ईरानी जनता इन क्षमताओं की रक्षा उसी तरह करेगी, जैसे वह अपने जल, जमीन और हवाई सीमाओं की करती है। यह बयान ऐसे समय आया है, जब ईरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव लगातार बढ़ रहा है कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम पर लचीलापन दिखाए।
मुज्ताबा खामनेई ने अपने संबोधन में कहा कि ईरानी राष्ट्र न सिर्फ अपने देश के भीतर, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी एकजुट है। उन्होंने 90 मिलियन ईरानियों की बात करते हुए इसे एक “आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और औद्योगिक शक्ति” बताया, जो नैनो टेक्नोलॉजी से लेकर बायोटेक और न्यूक्लियर तक हर क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर रही है। यह बयान ईरान की उस रणनीति की ओर इशारा करता है, जिसमें वह खुद को सिर्फ एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक तकनीकी ताकत के रूप में स्थापित करना चाहता है।
अपने बयान में मुज्ताबा खामनेई ने अमेरिका और उसके सहयोगी देशों पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि अमेरिकी ठिकाने खुद अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने में सक्षम नहीं हैं, ऐसे में वे क्षेत्रीय देशों को सुरक्षा देने का दावा कैसे कर सकते हैं। यह बयान सीधे तौर पर उन खाड़ी देशों के लिए भी संदेश माना जा रहा है, जो सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर हैं।
फारस की खाड़ी और ओमान सागर का जिक्र करते हुए खामनेई ने कहा कि इस पूरे इलाके का भविष्य अमेरिका के बिना ज्यादा स्थिर और समृद्ध हो सकता है। उन्होंने यह भी साफ किया कि ईरान अपने पड़ोसी सुन्नी देशों के साथ रिश्ते सुधारना चाहता है, जबकि उसकी असली टकराव की स्थिति इजराइलऔर अमेरिका के साथ है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, इस बयान से यह साफ हो गया है कि ईरान अपने न्यूक्लियर कार्यक्रम और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक मुद्दों पर पीछे हटने वाला नहीं है। यह रुख ऐसे समय में सामने आया है, जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान पर बातचीत के जरिए समाधान निकालने का दबाव है। लेकिन तेहरान का यह आक्रामक और आत्मविश्वासी रुख संकेत देता है कि आने वाले दिनों में कूटनीति और टकराव, दोनों ही रास्ते खुले रहेंगे।
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