
ISRO GSLV-F17 Launch: 4 सितंबर 2026 की तड़के 2:55 बजे, जब पूरा देश चैन की नींद सो रहा था, तब आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा द्वीप पर एक अलग ही घबराहट और उम्मीद का माहौल था। लॉन्च कॉम्प्लेक्स और मिशन कंट्रोल रूम में इसरो (ISRO) के करीब 16,500 वैज्ञानिक, इंजीनियर और कर्मचारी सांसें थामे बैठे थे। हर चेहरे पर तनाव था, क्योंकि पिछले कुछ समय से भारत की लॉन्च क्षमताओं पर सवाल उठ रहे थे। लेकिन ठीक 19 मिनट बाद, यानी सुबह 3:14 बजे, कंट्रोल रूम तालियों की गड़गड़ाहट और मुस्कानों से गूंज उठा। केंद्रीय विज्ञान मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने इसे "अंतरिक्ष में भारत की एक और बड़ी छलांग" करार दिया। GSLV-F17 के जरिए EOS-05 सैटेलाइट अपनी तय कक्षा में पहुँच चुका था। यह भारत का पहला ऐसा एडवांस्ड इमेजिंग सैटेलाइट है जिसे सीधे जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में स्थापित किया गया है, जो विजिबल, इंफ्रारेड और मल्टी-स्पेक्ट्रल बैंड्स में धरती की हाई-क्वालिटी तस्वीरें भेजेगा।
GSLV Mk II का सफर सीधा और आसान नहीं रहा। शुरुआती दौर में इसे कई तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लेकिन इसी कार्यक्रम ने भारत को क्रायोजेनिक इंजन तकनीक में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ाया। 1990 के दशक में भारत को भारी संचार उपग्रहों को ऊंची कक्षाओं में पहुंचाने के लिए क्रायोजेनिक इंजन की जरूरत थी। ये इंजन बेहद कम तापमान पर रखे गए तरल हाइड्रोजन और तरल ऑक्सीजन का इस्तेमाल करते हैं और रॉकेट के ऊपरी चरण को ज्यादा ऊर्जा देते हैं। भारत ने इस तकनीक के लिए रूस से सहयोग लेने की कोशिश की। लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव और तकनीक हस्तांतरण से जुड़ी पाबंदियों के कारण भारत को पूरी तकनीक आसानी से नहीं मिल सकी। यहीं से कहानी ने दूसरा मोड़ लिया। भारत ने तकनीक खरीदने के बजाय उसे खुद विकसित करने का रास्ता चुना। इसमें वर्षों लगे। परीक्षण हुए, असफलताएं मिलीं, देरी हुई और कई बार मिशन उम्मीद के मुताबिक नहीं चले। लेकिन भारतीय वैज्ञानिक पीछे नहीं हटे। आज GSLV की हर सफल उड़ान उस लंबी तकनीकी यात्रा की याद दिलाती है।
Another giant leap for India in Space!
Kudos to Team @isro on the successful launch of GSLV-F17/EOS-05.
EOS-05 is a state-of-the-art Earth Observation satellite and India’s first imaging satellite from Geosynchronous Orbit, enabling advanced imaging across visible, infrared,… pic.twitter.com/1HHJrWM7ze— Dr Jitendra Singh (@DrJitendraSingh) September 3, 2026
EOS-05 की सफलता का एक और कारण है। इसका संबंध सीधे 2021 में असफल हुए GISAT-1 मिशन से जुड़ता है। अगस्त 2021 में GSLV-F10 के जरिए GISAT-1 को लॉन्च करने की कोशिश की गई थी। लेकिन क्रायोजेनिक अपर स्टेज में आई समस्या के कारण मिशन सफल नहीं हो सका। उस समय भारत को जिस तरह की लगातार अर्थ इमेजिंग क्षमता हासिल करनी थी, वह सपना अधूरा रह गया। करीब पांच साल बाद उसी व्यापक लक्ष्य को EOS-05 के जरिए फिर से आगे बढ़ाया गया है। इस बार GSLV-F17 ने सफलतापूर्वक उड़ान भरी और उपग्रह को Sub-GTO में पहुंचाया। यही वजह है कि इस मिशन की सफलता को सिर्फ एक और लॉन्च के रूप में नहीं देखा जा रहा।
EOS-05 भारत का पहला ऐसा इमेजिंग सैटेलाइट है जिसे जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से काम करने के लिए डिजाइन किया गया है। ISRO के मुताबिक यह एक अत्याधुनिक Earth Observation spacecraft है। फिलहाल GSLV-F17 ने इसे Sub-GTO में पहुंचाया है, जिसके बाद सैटेलाइट को आगे अपनी निर्धारित कक्षा की ओर ले जाने की प्रक्रिया होगी। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका ऑर्बिटल पोजिशन होगा।
पृथ्वी की निचली कक्षाओं में घूमने वाले अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट किसी इलाके के ऊपर से गुजरते हैं और उस समय तस्वीरें लेते हैं। यानी एक जगह की निगरानी लगातार नहीं हो पाती। EOS-05 का जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट वाला डिजाइन इस मामले में अलग क्षमता देता है। लगभग 36,000 किलोमीटर की ऊंचाई पर अपनी निर्धारित कक्षा में पहुंचने के बाद यह एक बड़े इलाके को लगातार देखने में सक्षम होगा। यानी तस्वीरों के बीच का अंतर कम होगा और तेजी से बदलती घटनाओं पर ज्यादा लगातार नजर रखी जा सकेगी।
इस तरह की लगातार Earth Observation क्षमता कई क्षेत्रों में उपयोगी हो सकती है। चक्रवात तेजी से बनते और बदलते हैं। बाढ़ की स्थिति भी कुछ घंटों में पूरी तरह बदल सकती है। जंगल की आग, फसल की स्थिति, पर्यावरणीय बदलाव और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की निगरानी में भी लगातार डेटा काफी महत्वपूर्ण होता है। यही कारण है कि EOS-05 को सिर्फ एक सामान्य इमेजिंग सैटेलाइट नहीं माना जा रहा।इसके डेटा का इस्तेमाल मौसम और आपदा प्रबंधन से लेकर कृषि और पृथ्वी की सतह में होने वाले बदलावों की निगरानी तक में किया जा सकता है। इसकी लगातार निगरानी वाली क्षमता रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
अंतरिक्ष से किसी बड़े क्षेत्र पर लगातार नजर रखने की क्षमता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी उपयोगी है। सीमा से जुड़े इलाके, समुद्री क्षेत्र और तेजी से बदलने वाली गतिविधियों की निगरानी में लगातार उपलब्ध इमेजरी मददगार हो सकती है। हालांकि इसे सीधे केवल सैन्य निगरानी वाला उपग्रह कहना सही नहीं होगा। EOS-05 का घोषित आधार Earth Observation है और इसकी उपयोगिता नागरिक तथा रणनीतिक दोनों क्षेत्रों में हो सकती है। यही इसकी असली ताकत है-एक ऐसा प्लेटफॉर्म जो एक साथ कई जरूरतें पूरी कर सकता है।
Mission Success!
GSLV-F17 has successfully accomplished its mission, placing EOS-05 into the intended orbit.
Sharing a few memorable moments from the lift-off.
For more information:https://t.co/VneB2jgZoY#GSLVF17 #EOS05 #ISRO pic.twitter.com/kv0zB6V5Vi— ISRO (@isro) September 3, 2026
GSLV-F17 की सफलता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ISRO के लिए लंबे अंतराल के बाद आया लॉन्च था। जनवरी 2026 में PSLV-C62 की विफलता के बाद यह एजेंसी की पहली बड़ी लॉन्च वापसी थी। और यह कोई साधारण payload भी नहीं था। EOS-05 भारत की Earth Observation क्षमता में एक नई दिशा खोलता है। साथ ही GSLV Mk II ने एक बार फिर साबित किया कि मुश्किल दौर के बावजूद यह रॉकेट भारत के महत्वपूर्ण मिशनों को संभाल सकता है। GSLV-F16 के जरिए जुलाई 2025 में NASA-ISRO के NISAR मिशन को सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया था। अब F17 की सफलता ने इस रॉकेट परिवार के लिए एक और महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ दिया है। ISRO के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक GSLV-F17 इस श्रृंखला का 19वां मिशन है।
ISRO के लिए फिलहाल चुनौती सिर्फ एक सफल मिशन तक सीमित नहीं है। PSLV की लगातार विफलताओं ने लॉन्च शेड्यूल और रॉकेट की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए थे। जनवरी 2026 की PSLV-C62 विफलता के बाद जांच शुरू हुई और अगले मिशनों को लेकर सावधानी बढ़ी। ऐसे समय में GSLV-F17 की सफलता का मनोवैज्ञानिक महत्व भी है। इससे यह संदेश गया है कि एक लॉन्च सिस्टम में समस्या आने का मतलब पूरे भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का रुक जाना नहीं है। ISRO के पास अलग-अलग लॉन्च व्हीकल और मिशन प्रोफाइल के हिसाब से कई तकनीकी विकल्प मौजूद हैं।
लेकिन ISRO के लिए यह जश्न बहुत लंबा नहीं चलेगा। आगे कई बड़े मिशन कतार में हैं और सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में गगनयान कार्यक्रम शामिल है। भारत मानव अंतरिक्ष उड़ान की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है और आने वाले परीक्षण मिशन इस पूरे कार्यक्रम के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे। ऐसे में GSLV-F17 की सफलता सिर्फ आज की उपलब्धि नहीं है। यह आने वाले मिशनों के लिए जरूरी आत्मविश्वास भी देती है।
GSLV को 'नॉटी बॉय' कहने के पीछे उसकी पुरानी तकनीकी चुनौतियों और उतार-चढ़ाव की कहानी है। लेकिन 4 सितंबर की सुबह इस नाम का एक अलग ही मतलब निकलता है। GSLV-F17 ने उड़ान भरी, EOS-05 को सफलतापूर्वक Sub-GTO में पहुंचाया और भारत की पहली जियोसिंक्रोनस इमेजिंग सैटेलाइट क्षमता की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया। एक रॉकेट जिसने कभी भारत को परेशान किया, वही आज भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता की कहानी का हिस्सा बन गया है। और शायद यही इस मिशन की सबसे बड़ी कहानी है-नाकामी के बाद वापसी। 'नॉटी बॉय' ने इस बार शरारत नहीं की, उसने काम किया।
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