
कानपुर में सामने आए अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गुरुवार को इस मामले से जुड़े किडनी ट्रांसप्लांट के डोनर आयुष चौधरी और रिसीवर पारुल तोमर को बेहतर इलाज के लिए लखनऊ रेफर कर दिया गया। दोनों मरीजों को डॉक्टरों की टीम की निगरानी में एम्बुलेंस से लखनऊ के राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल भेजा गया, जहां नेफ्रोलॉजी विभाग में उनका इलाज जारी रहेगा।
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने भी कड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है। जांच में कई निजी अस्पतालों में अवैध तरीके से किडनी ट्रांसप्लांट कराने की बात सामने आई है।
छापेमारी के बाद डोनर और रिसीवर को पहले कानपुर के Hallet Hospital में भर्ती कराया गया था। यहां डॉक्टरों की टीम ने दोनों का प्राथमिक इलाज किया। लेकिन अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट से जुड़ी विशेष सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। इसलिए डॉक्टरों ने बेहतर इलाज के लिए दोनों मरीजों को लखनऊ के Ram Manohar Lohia Hospital रेफर करने का फैसला लिया। अब दोनों मरीजों की निगरानी विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम कर रही है।
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इस बड़े अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का खुलासा एक छोटे से विवाद के बाद हुआ। बिहार के समस्तीपुर का रहने वाला एमबीए छात्र आयुष चौधरी आर्थिक तंगी के कारण अपनी एक किडनी बेचने के लिए तैयार हुआ था। बताया जा रहा है कि आयुष ने 10 लाख रुपये में किडनी बेचने का सौदा किया था। लेकिन उसे तय रकम से 50 हजार रुपये कम दिए गए। इसी बात से नाराज होकर उसने पुलिस को जानकारी दे दी। इसके बाद क्राइम ब्रांच और स्वास्थ्य विभाग की टीम ने 31 मार्च को कई अस्पतालों में छापेमारी की। जांच में सामने आया कि बिना जरूरी अनुमति और सुविधाओं के किडनी ट्रांसप्लांट किए जा रहे थे।
जांच में यह भी सामने आया कि यह गिरोह लंबे समय से सक्रिय था। पुलिस के अनुसार अब तक 60 से ज्यादा अवैध किडनी ऑपरेशन किए जा चुके हैं।
रैकेट का तरीका कुछ इस तरह था:
यह पूरा काम ऐसे अस्पतालों में हो रहा था जहां किडनी ट्रांसप्लांट की कोई आधिकारिक अनुमति नहीं थी।
मामले के खुलासे के बाद स्वास्थ्य विभाग ने सख्त कदम उठाए हैं। Ahuja Hospital का लाइसेंस रद्द, Priya Hospital का लाइसेंस रद्द, Med Life Hospital को पहले ही सील किया जा चुका है प्रशासन ने इन अस्पतालों को तीन दिन के भीतर अपना सारा सामान हटाने का आदेश भी दिया है।
मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. संजय काला के मुताबिक मरीजों को बेहतर इलाज के लिए लखनऊ भेजा गया है क्योंकि वहां किडनी ट्रांसप्लांट से जुड़ी विशेष यूनिट, आईसीयू और विशेषज्ञ डॉक्टर मौजूद हैं। उन्होंने बताया कि कानपुर में डॉक्टरों की टीम ने पूरी कोशिश करते हुए रिसीवर पायल का क्रिएटिनिन स्तर 3.9 से घटाकर 1.8 तक पहुंचा दिया था, जो इलाज के लिहाज से एक महत्वपूर्ण सुधार माना जाता है।
किडनी कांड में अब तक कई गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। पुलिस ने Dr. Surjit Singh Ahuja, Dr. Preeti Ahuja सहित पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। हालांकि पुलिस के अनुसार इस रैकेट के असली मास्टरमाइंड अभी फरार हैं। चार अन्य डॉक्टरों की तलाश जारी है। जांच एजेंसियों को शक है कि इस गिरोह के तार सिर्फ कानपुर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दूसरे राज्यों से भी जुड़े हो सकते हैं।
इस पूरे मामले ने निजी अस्पतालों में चल रही अवैध गतिविधियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते इस मामले का खुलासा नहीं होता तो यह रैकेट और भी बड़े स्तर पर फैल सकता था। फिलहाल पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन मिलकर पूरे नेटवर्क की जांच कर रहे हैं।
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