
Khet Bachao Abhiyan Shivraj Singh chouhan: भारत की खेती आज दोहरी चुनौती का सामना कर रही है। एक तरफ बढ़ती आबादी के लिए अधिक उत्पादन की जरूरत है, तो दूसरी तरफ लगातार रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते इस्तेमाल से मिट्टी की सेहत पर दबाव बढ़ रहा है। इसी चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार अब सीधे खेतों तक पहुंचने की तैयारी में है।
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान 1 जून से देशव्यापी "खेत बचाओ अभियान" की शुरुआत करने जा रहे हैं। यह अभियान पूरे जून महीने तक चलेगा और इसका उद्देश्य किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग, मिट्टी की उर्वरता संरक्षण और वैकल्पिक कृषि तकनीकों के प्रति जागरूक करना है।
इस अभियान की शुरुआत मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के रामसिया गांव से होगी। कृषि मंत्री स्वयं देशभर का दौरा करेंगे और किसानों से सीधे संवाद करेंगे। जानकारी के मुताबिक, शिवराज सिंह चौहान ने विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों से फोन पर संपर्क किया है और उन्हें पत्र लिखकर अभियान में सहयोग की अपील भी की है। सरकार चाहती है कि यह केवल सरकारी कार्यक्रम न बनकर किसानों की भागीदारी वाला जन-अभियान बने।
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पिछले कुछ वर्षों में यूरिया और अन्य रासायनिक उर्वरकों का उपयोग तेजी से बढ़ा है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि आवश्यकता से अधिक उर्वरक इस्तेमाल करने से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है, उत्पादन लागत बढ़ती है और लंबे समय में खेती की उत्पादकता पर भी असर पड़ सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई बार संतुलित उर्वरक उपयोग और नैनो यूरिया जैसे विकल्पों को अपनाने पर जोर दे चुके हैं। इसी दिशा में अब केंद्र सरकार जमीनी स्तर पर जागरूकता अभियान शुरू कर रही है।
अभियान के दौरान किसानों को कई महत्वपूर्ण विषयों पर जानकारी दी जाएगी, जिनमें शामिल हैं:
सरकार का मानना है कि यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से उर्वरकों का उपयोग करेंगे तो उत्पादन पर असर डाले बिना लागत कम की जा सकती है और मिट्टी की गुणवत्ता भी बेहतर बनी रहेगी।
यह अभियान ऐसे समय शुरू किया जा रहा है जब पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर दबाव बना हुआ है। हाल ही में केंद्र सरकार ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में पश्चिम एशिया की स्थिति को लेकर मंत्रियों के समूह की बैठक की थी। बैठक में पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, उर्वरक और अन्य आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता की समीक्षा की गई। सरकार ने स्पष्ट किया कि देश में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सामान्य बनी हुई है और लोगों को किसी प्रकार की घबराहट में खरीदारी करने की जरूरत नहीं है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, खरीफ 2026 सीजन के लिए देश को लगभग 390.54 लाख मीट्रिक टन उर्वरकों की आवश्यकता होगी। वर्तमान में 200.47 लाख मीट्रिक टन उर्वरक उपलब्ध हैं, जो कुल आवश्यकता का 51 प्रतिशत से अधिक है। सरकार का कहना है कि पश्चिम एशिया संकट के बावजूद आयात और घरेलू उत्पादन के माध्यम से अतिरिक्त भंडार तैयार किया जा रहा है। आने वाले महीनों में बड़ी मात्रा में डीएपी और एनपीके उर्वरकों की खेप भारतीय बंदरगाहों पर पहुंचने की उम्मीद है।
भारत अपनी उर्वरक जरूरतों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। देश लगभग 70 प्रतिशत यूरिया और 100 प्रतिशत पोटाश का आयात करता है। इन आयातों का बड़ा हिस्सा सऊदी अरब, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात, जॉर्डन और ईरान जैसे देशों से आता है। ऐसे में पश्चिम एशिया में किसी भी तरह की अस्थिरता सीधे भारतीय कृषि लागत को प्रभावित कर सकती है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि उर्वरकों का विवेकपूर्ण उपयोग और घरेलू विकल्पों को बढ़ावा देना भविष्य में भारत की आयात निर्भरता कम करने में मदद कर सकता है।
सरकार का मानना है कि केवल उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना पर्याप्त नहीं है। जरूरी यह भी है कि उनका सही और वैज्ञानिक उपयोग हो। इसी सोच के साथ "खेत बचाओ अभियान" को खेत स्तर पर एक बड़े जन-जागरूकता कार्यक्रम के रूप में तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य किसानों को यह समझाना है कि अधिक यूरिया हमेशा अधिक उत्पादन की गारंटी नहीं देता, बल्कि संतुलित पोषण ही बेहतर खेती की कुंजी है।
कृषि एक्सपर्ट्स के अनुसार, भारत की खाद्य सुरक्षा केवल उत्पादन बढ़ाने से नहीं, बल्कि मिट्टी की दीर्घकालिक सेहत बनाए रखने से भी जुड़ी हुई है। ऐसे में "खेत बचाओ अभियान" को केवल उर्वरक उपयोग कम करने की पहल नहीं, बल्कि टिकाऊ खेती और भविष्य की कृषि सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। आने वाले एक महीने में यह देखना दिलचस्प होगा कि देशभर में किसानों के बीच यह अभियान कितना प्रभाव छोड़ पाता है और मिट्टी संरक्षण को लेकर कितनी जागरूकता पैदा कर पाता है।
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