Japan Fires Back at China Criticism: जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी ने चीन के आरोपों का जवाब देते हुए क्या कहा? ताइवान को लेकर जापान और चीन के बीच तनाव क्यों बढ़ रहा है? शांगरी-ला डायलॉग क्या है और इस सम्मेलन में चीन की अनुपस्थिति चर्चा का विषय क्यों बनी?

एशिया में सुरक्षा और सैन्य संतुलन को लेकर चल रही बहस के बीच जापान ने चीन के आरोपों पर खुलकर जवाब दिया है। सिंगापुर में आयोजित प्रतिष्ठित शांगरी-ला डायलॉग सुरक्षा सम्मेलन में जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी ने स्पष्ट कहा कि उनका देश अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करता रहेगा और इसे "नया सैन्यवाद" बताना तथ्यों से परे है। कोइजुमी का यह बयान ऐसे समय आया है जब चीन लगातार जापान की नई रक्षा नीतियों की आलोचना कर रहा है। बीजिंग का दावा है कि टोक्यो धीरे-धीरे सैन्य विस्तार की दिशा में बढ़ रहा है, जिससे पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अस्थिरता पैदा हो सकती है।

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द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बदला था जापान का रास्ता

द्वितीय विश्व युद्ध में हार के बाद जापान ने दशकों तक शांतिवादी नीति अपनाई। उसके संविधान ने सैन्य गतिविधियों पर कई सीमाएं तय कर दी थीं। लेकिन बदलते वैश्विक सुरक्षा माहौल, उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षणों और चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति ने जापान को अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया। हाल के वर्षों में जापान ने रक्षा बजट बढ़ाया है, नई सैन्य तकनीकों में निवेश किया है और अमेरिका के साथ अपने सुरक्षा सहयोग को भी मजबूत किया है। प्रधानमंत्री साने ताकाइची के नेतृत्व में यह प्रक्रिया और तेज होती दिखाई दे रही है।

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बिना नाम लिए चीन पर साधा निशाना

शांगरी-ला डायलॉग में बोलते हुए कोइजुमी ने सीधे चीन का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा साफ था। उन्होंने कहा कि दुनिया में एक ऐसा देश है जिसके पास बड़ी संख्या में परमाणु हथियार और रणनीतिक बमवर्षक विमान हैं, जबकि जापान के पास ऐसे हथियार नहीं हैं। इसके बावजूद जापान को सैन्यवाद की ओर बढ़ता देश बताया जाता है, जो आश्चर्यजनक है।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार चीन के पास वर्तमान में 600 से अधिक परमाणु हथियार हैं और आने वाले वर्षों में इस संख्या को लगभग 1,000 तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। यही कारण है कि क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर कई देशों की चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं।

ताइवान बना तनाव का बड़ा कारण

जापान और चीन के बीच तनाव केवल रक्षा बजट या सैन्य तैयारियों तक सीमित नहीं है। ताइवान का मुद्दा दोनों देशों के संबंधों में सबसे संवेदनशील विषय बन चुका है। पिछले वर्ष नवंबर में प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने संकेत दिया था कि यदि चीन ताइवान पर सैन्य कार्रवाई करता है तो जापान हस्तक्षेप करने पर विचार कर सकता है। इस बयान के बाद बीजिंग ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है, जबकि ताइवान स्वयं को एक स्वशासित लोकतांत्रिक इकाई के रूप में संचालित करता है। इस मुद्दे पर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की भूमिका भी क्षेत्रीय राजनीति को और जटिल बना देती है।

चीन की सैन्य गतिविधियों पर जापान की चिंता

कोइजुमी ने सम्मेलन में यह भी कहा कि चीन लगातार अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है, लेकिन उसकी सैन्य गतिविधियों और क्षमताओं को लेकर पर्याप्त पारदर्शिता नहीं है।

उन्होंने कहा कि जापान के लिए यह चिंता का विषय है कि क्षेत्र में तेजी से सैन्य विस्तार हो रहा है, जबकि उसके बारे में पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं होती। उनके अनुसार, सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए जापान का अपनी रक्षा तैयारियों को मजबूत करना स्वाभाविक कदम है। रक्षा मंत्री ने यह भी दोहराया कि जापान की वैश्विक पहचान एक शांतिप्रिय और जिम्मेदार राष्ट्र की रही है और कुछ राजनीतिक आरोप उस छवि को बदल नहीं सकते।

क्या है शांगरी-ला डायलॉग?

शांगरी-ला डायलॉग एशिया का सबसे महत्वपूर्ण रक्षा और सुरक्षा सम्मेलन माना जाता है। इसका आयोजन हर वर्ष सिंगापुर में किया जाता है, जहां दुनिया भर के रक्षा मंत्री, सैन्य अधिकारी, रणनीतिक विशेषज्ञ और नीति निर्माता एक मंच पर आते हैं। इस वर्ष करीब 45 देशों के प्रतिनिधियों ने सम्मेलन में हिस्सा लिया। दिलचस्प बात यह रही कि चीन ने अपेक्षाकृत छोटा प्रतिनिधिमंडल भेजा और लगातार दूसरे वर्ष उसके रक्षा मंत्री डोंग जुन इस कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। कोइजुमी ने कहा कि उन्हें इस बात का अफसोस है कि इस बार चीनी रक्षा मंत्री से मुलाकात नहीं हो सकी, क्योंकि दोनों देशों के बीच संवाद क्षेत्रीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।

एशिया की सुरक्षा राजनीति नए मोड़ पर

जापान और चीन के बीच बढ़ती बयानबाजी केवल दो देशों का विवाद नहीं है। इसका असर पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है। एक तरफ चीन अपनी सैन्य शक्ति का विस्तार कर रहा है, वहीं जापान अपनी रक्षा तैयारियों को मजबूत करने में जुटा है। ऐसे में आने वाले वर्षों में एशिया की सुरक्षा राजनीति किस दिशा में जाएगी, यह दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक चर्चाओं में शामिल रहेगा।

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