गार्डन सिटी नहीं 'गार्बेज सिटी', बेंगलुरू जैसे शहर को किसने बताया कूड़े का ढेर

Published : Jun 28, 2026, 12:56 PM IST
bengaluru garbage city

सार

बेंगलुरू को खासतौर पर उसके गार्डन्स और हरियाली के लिए जाना जाता है। लेकिन तेजी से होते शहरीकरण के बीच आखिर किसने इस शहर को गार्बेज सिटी कहा है, आइए जानते हैं। 

बायोकॉन की फाउंडर किरण मजूमदार-शॉ ने बेंगलुरु की शहरी प्लानिंग को लेकर नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक ग्राफिक शेयर किया, जिसमें शहर के मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर की तुलना उस डिजाइन से की गई है जिसे अधिक हरियाली और बेहतर सार्वजनिक सुविधाओं के साथ विकसित किया जा सकता था पोस्ट शेयर करते हुए किरण मजूमदार शॉ ने लिखा, "हमें अपनी सड़कों की डिजाइन और प्लानिंग इस तरह करनी चाहिए जो हमारे 'गार्डन सिटी' की पहचान को बनाए रखे। लेकिन अफसोस की बात है कि आज यह 'गार्बेज सिटी' बन गया है और यहां हरियाली लगातार कम होती जा रही है।"

ग्राफिक में दिखाई गई मौजूदा और बेहतर डिजाइन की तुलना

किरण मजूमदार-शॉ द्वारा साझा किए गए ग्राफिक में एलिवेटेड रोड कॉरिडोर के दो अलग-अलग मॉडल दिखाए गए। पहले हिस्से का टाइटल "हमने क्या बनाया" रखा गया था। इसमें कंक्रीट से बनी सड़क दिखाई गई। साथ ही दावा किया गया कि इस निर्माण के दौरान पेड़ों को हटा दिया गया, फुटपाथ और सर्विस रोड खत्म कर दिए गए तथा लोगों के लिए जरूरी सार्वजनिक सुविधाएं भी नहीं छोड़ी गईं। दूसरे हिस्से का टाइटल "हम क्या बना सकते थे" था। इसमें उसी सड़क को पेड़ों, साइकिल ट्रैक, चौड़े फुटपाथ, बेहतर स्ट्रीट लाइट, बैठने के लिए बेंच और कूड़ेदान जैसी सुविधाओं के साथ दिखाया गया था।

सोशल मीडिया पर लोगों ने क्या कहा?

किरण मजूमदार-शॉ की इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों ने अपनी राय रखी। कई यूजर्स ने शहर की मौजूदा स्थिति के लिए खराब शहरी प्लानिंग, कमजोर प्रशासन और नियमों के सही तरीके से पालन न होने को जिम्मेदार बताया।

खराब प्लानिंग और भ्रष्टाचार पर उठे सवाल

एक यूज़र ने लिखा, "मैं पूरी तरह सहमत हूं। प्रशासन और नेताओं ने मिलकर इस शहर को नुकसान पहुंचाया है। उनकी दिलचस्पी कंक्रीट की सड़कों में ज्यादा है क्योंकि वहां लोहा और सीमेंट जैसे निर्माण कार्यों में ज्यादा कमीशन मिलता है। पेड़ लगाने में ऐसा कोई फायदा नहीं होता।"

सस्टेनेबल शहरों की कमी पर लोगों की चिंता

एक अन्य यूज़र ने लिखा, "भारतीय शहर टिकाऊ यानी सस्टेनेबल नहीं हैं। हम टैक्स और खर्च तो अंतरराष्ट्रीय शहरों जैसा करते हैं, लेकिन सुविधाएं अब भी विकासशील देशों जैसी हैं। यह दुखद स्थिति है।"

बेहतर रखरखाव और कानून लागू करने की मांग

एक तीसरे यूज़र ने कहा, "जो इंफ्रास्ट्रक्चर पहले से मौजूद है, उसका सही तरीके से रखरखाव किया जाए और नियमों को बिना किसी भेदभाव के लागू किया जाए, तो लोगों को काफी राहत मिल सकती है। फिलहाल लोगों का धैर्य खत्म होता जा रहा है और नियमों का पालन भी कम हो रहा है।"

'गार्डन सिटी' की पहचान बचाने की अपील

एक अन्य व्यक्ति ने लिखा, "अगर सही प्लानिंग हो, काम तय मानकों के अनुसार किया जाए और कानूनों को सख्ती से लागू किया जाए तो अच्छे नतीजे मिल सकते हैं। हालांकि शहर को पहले ही काफी नुकसान हो चुका है। आज हालात ऐसे हैं कि सब कुछ बिना किसी स्पष्ट व्यवस्था के चल रहा है। गार्डन सिटी अब गारबेज सिटी बन गई है। क्या सरकार और प्रशासन को इसकी चिंता नहीं है?"

कुछ लोगों ने व्यावहारिक चुनौतियां भी गिनाईं

हालांकि सभी लोग इस विचार से पूरी तरह सहमत नहीं दिखे। एक यूज़र ने लिखा, "यह एक अच्छा विचार है, लेकिन बेंगलुरु जैसे बड़े शहर में इसे हर जगह लागू करना आसान नहीं होगा। शहर में हर स्थान पर इतनी चौड़ी सड़कें नहीं हैं और लोग भी सार्वजनिक सुविधाओं की ठीक तरह से देखभाल नहीं करते।" एक अन्य व्यक्ति ने कहा, "जब तक भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा और अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक हालात नहीं बदलेंगे। कई सरकारी कर्मचारी और अधिकारी केवल बजट से अपना हिस्सा निकालने पर ध्यान देते हैं। ऐसे में बेहतर बेंगलुरु और अच्छी जीवनशैली के लिए गंभीर योजना बनाना मुश्किल लगता है।"

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