गिद्ध संरक्षण में मध्यप्रदेश बना मिसाल! CM मोहन यादव ने 5 दुर्लभ गिद्धों को नई जिंदगी दी

Published : Feb 23, 2026, 08:50 PM IST
CM Mohan Yadav Vultures Conservation

सार

Madhya Pradesh Vultures: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हलाली डेम में लुप्तप्राय 5 गिद्धों को प्राकृतिक आवास में मुक्त किया। इस दौरान उन्होंने वन विभाग और स्थानीय प्रशासन को गिद्ध पक्षी संरक्षण के प्रयासों के लिए बधाई दी। 

भोपाल: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सोमवार को हलाली डेम क्षेत्र में लुप्तप्राय प्रजाति के 5 गिद्धों को उनकी प्राकृतिक जगह पर छोड़कर राज्य में पक्षी संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दिखाया। इस ग्रुप में चार भारतीय गिद्ध (जिप्स इंडिकस) और एक सिनेरियस गिद्ध (एजिपीयस मोनाकस) शामिल था। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा, 'पारिस्थितिकी तंत्र में सहयोगी पशु पक्षियों के संरक्षण के लिए राज्य सरकार प्रतिबद्ध है। मध्यप्रदेश जहां बाघ, तेंदुआ और अन्य वन्य प्राणियों की सर्वाधिक संख्या वाला राज्य है। वहीं गिद्ध संरक्षण में भी देश में नंबर-1 है। मध्यप्रदेश में सभी प्रांतों से अधिक संख्या में गिद्ध पाए जाते हैं। इनमें प्रवासी गिद्ध भी शामिल हैं। पारस्थितिकी तंत्र में इन पक्षियों का विशेष योगदान है।' मुख्यमंत्री मोहन यादव ने वन विभाग और स्थानीय प्रशासन को गिद्ध पक्षी संरक्षण के प्रयासों के लिए बधाई दी।

गिद्धों की सुरक्षित रिहाई

इस अवसर पर बताया गया कि पांच दुर्लभ गिद्धों को भोपाल स्थित गिद्ध संरक्षण प्रजनन केंद्र में व्यवस्थित अनुकूलन और अवलोकन के बाद छोड़ा गया। सभी गिद्धों में उच्च परिशुद्धता वाले GPS-GSM उपग्रह ट्रांसमीटर लगाए गए, ताकि उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। टैगिंग प्रक्रिया वन विभाग, स्थानीय प्रशासन और वाइल्डलाइफ SOS के वन्यजीव पशु चिकित्सक की देखरेख में संपन्न हुई। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह पहल मध्य भारत के विकसित होते ‘गिद्ध परिदृश्य’ को समझने में मददगार है। भारतीय गिद्ध सामान्यतः एक ही क्षेत्र में रहते हैं, जबकि सिनेरियस गिद्ध मध्य एशियाई फ्लाई-वे के अंतर्गत लंबी दूरी का प्रवास करते हैं, जो 30 से अधिक देशों तक फैले विश्व के प्रमुख प्रवासी पक्षी गलियारों में शामिल है।

गिद्ध और पक्षी संरक्षण के प्रयास

मध्यप्रदेश के वन विभाग ने WWF-इंडिया और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के सहयोग से गिद्ध उपग्रह टेलीमेट्री प्रोग्राम शुरू किया है। इसका उद्देश्य गिद्धों की गतिविधियों, आवागमन पैटर्न और मानव-जनित दबावों को समझना है। टेलीमेट्री डेटा से गिद्धों के प्रमुख ठहराव, भोजन स्थल और उच्च जोखिम वाले क्षेत्र जैसे बिजली के झटके, विषाक्तता और आवास क्षरण की पहचान होती है। इस जानकारी के आधार पर सशक्त संरक्षण रणनीतियाँ और भू-दृश्य स्तर पर डेटा-आधारित योजनाएँ विकसित की जाती हैं। राज्य में लुप्तप्राय गिद्धों का संरक्षण और उनकी पारिस्थितिकी तंत्र में भूमिका दीर्घकालिक रूप से सुरक्षित होती है। मध्यप्रदेश गिद्ध संरक्षण में अग्रणी होने के साथ-साथ डेटा-आधारित, भू-दृश्य स्तरीय संरक्षण के क्षेत्र में भी देश में मिसाल कायम कर रहा है।

मध्यप्रदेश में गिद्धों का सांस्कृतिक और पर्यावरणीय महत्व

भारतीय परंपरा में गिद्धों को शक्ति और सम्मान का प्रतीक माना गया है। रामायण में जटायु और उसके भाई सम्पाती की गाथाएं गिद्धों की वीरता और बलिदान को दर्शाती हैं। पर्यावरण में भी गिद्ध प्रकृति के सफाईकर्मी हैं। वे पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं और बीमारियों को फैलने से रोकने में भी अहम योगदान देते हैं। प्रदेश में भारतीय गिद्ध, सिनेरियस गिद्ध, मिस्र गिद्ध और हिमालयन ग्रिफॉन जैसी प्रजातियां पाई जाती हैं। हाल ही में वल्चर एस्टिमेशन-2026 के पहले दिन दक्षिण पन्ना वन प्रभाग में 1000 से अधिक गिद्ध देखे गए, जो पिछले वर्षों में सबसे अधिक संख्या है।

 

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