
भोपाल। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि बेटे-बेटियों का विवाह करने के लिए सामूहिक विवाह एक बहुत अच्छा और व्यावहारिक तरीका है। उन्होंने कहा कि समाज में महंगे और दिखावे वाले विवाह बढ़ रहे हैं, जो चिंता का विषय है। ऐसे में मितव्ययिता अपनाना जरूरी है। समाज तेजी से बदल रहा है, इसलिए समय के साथ सोच में भी बदलाव लाना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने बताया कि उन्होंने अपने पुत्र का विवाह भी उज्जैन में एक सामूहिक विवाह सम्मेलन में कराया था। उनका कहना है कि शादियों में अनावश्यक खर्च से बचना चाहिए। सामूहिक विवाह से जो बचत होती है, उसका उपयोग परिवार की दूसरी जरूरतों और सुविधाओं के लिए किया जा सकता है।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने प्रदेशवासियों से अपील की कि विवाह या मृत्यु भोज जैसे कार्यक्रमों में दिखावे और फिजूल खर्च से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि बागेश्वर धाम में आयोजित सामूहिक विवाह एक यज्ञ के समान हैं और ऐसे सकारात्मक कार्य लंबे समय तक याद रखे जाते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय संस्कृति को मजबूत करने के लिए छतरपुर में कैंसर अस्पताल की सौगात दी है। हमारे धार्मिक स्थल चमत्कारिक होते हैं और अब मंदिरों के आसपास स्वास्थ्य सुविधाएं भी उपलब्ध हो रही हैं।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव बागेश्वर धाम सरकार में आयोजित सामूहिक कन्या विवाह सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जिन बेटे-बेटियों का विवाह इस सम्मेलन में हुआ है, यदि उन्हें रोजगार या किसी काम की जरूरत होगी तो सरकार हर संभव सहायता देगी। उन्होंने यह भी कहा कि विवाह जीवन के 16 संस्कारों में सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की दिशा दिखाता है। इस अवसर पर 300 नव दंपतियों को उन्होंने शुभकामनाएं दीं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि भारतीय सनातन संस्कृति को कमजोर करने के लिए कई बार बाहरी आक्रमण हुए, लेकिन हमारी संस्कृति हमेशा मजबूत होकर उभरी। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सोमनाथ मंदिर पर भी आक्रमण हुए थे, लेकिन आज उसकी भव्यता लगातार बढ़ रही है। इसी तरह अयोध्या राम मंदिर में भगवान श्रीराम की भव्य स्थापना हुई है। उन्होंने कहा कि बागेश्वर धाम ने भी सनातन संस्कृति को नई दिशा देने का काम किया है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य सरकार बेटियों के विवाह के लिए मुख्यमंत्री सामूहिक कन्या विवाह योजना के तहत 51 हजार रुपये की आर्थिक सहायता देती है। इससे परिवारों पर आर्थिक बोझ कम होता है।
उन्होंने यह भी बताया कि सनातन परंपरा में तीन ऐसी तिथियां हैं जब बिना मुहूर्त विवाह किए जा सकते हैं — देवउठनी एकादशी, बसंत पंचमी और अक्षय तृतीया। इन तिथियों पर सामूहिक विवाह आयोजित करने से खर्च कम होता है और समाज में सकारात्मक बदलाव आता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि सामूहिक विवाह जैसी अच्छी परंपराओं को अपनाकर सादगी और सामाजिक सहयोग की भावना को बढ़ावा दें।
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