
कभी कोलकाता के दक्षिण में स्थित भवानीपुर सीट को अजेय किला माना जाता था, लेकिन इस बार चुनावी नतीजों ने राजनीति के सबसे मजबूत दावों को भी पलट दिया। ममता बनर्जी ने मार्च में भरोसा जताया था कि वे भवानीपुर से एक वोट से भी जीत जाएंगी, लेकिन नतीजे इसके बिल्कुल उलट आए। भाजपा के सुवेंदु अधिकारी ने उन्हें 15,114 वोटों के अंतर से हराकर एक बार फिर बड़ा राजनीतिक संदेश दे दिया।
मतगणना के शुरुआती रुझानों में ममता बनर्जी मजबूत स्थिति में दिख रही थीं। सातवें राउंड तक उन्होंने 17,000 से ज्यादा वोटों की बढ़त बना ली थी। लेकिन इसके बाद तस्वीर तेजी से बदली। 14वें राउंड तक उनकी बढ़त घटकर 4,000 से भी कम रह गई और अंततः पूरी तरह खत्म हो गई। बाद के राउंड्स में वोटों का रुझान पूरी तरह भाजपा के पक्ष में चला गया, जिसने खेल पलट दिया।
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भवानीपुर लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। 2011 से लेकर अब तक ममता बनर्जी इस सीट का प्रतिनिधित्व करती रही हैं (नंदीग्राम चुनाव को छोड़कर)। लेकिन इस बार यह सीट सिर्फ एक चुनावी क्षेत्र नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गई थी। दोनों बड़े नेता खुद काउंटिंग सेंटर पर मौजूद रहे, जिससे मुकाबले की गंभीरता साफ झलकती है।
यह दूसरी बार है जब सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को चुनाव में हराया है। इससे पहले 2021 में नंदीग्राम में भी उन्होंने बेहद करीबी मुकाबले में उन्हें मात दी थी। उस हार के बाद ममता ने उपचुनाव के जरिए भवानीपुर से वापसी की थी, लेकिन इस बार उसी सीट पर हार ने राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं।
पहले राउंड में ममता बनर्जी को 1,996 वोटों की मामूली बढ़त मिली थी। दूसरे राउंड में अधीकारी थोड़े समय के लिए आगे निकले, लेकिन तीसरे राउंड में ममता ने फिर बढ़त बना ली। हालांकि, बाद के राउंड्स में वोटिंग ट्रेंड पूरी तरह बदल गया और भाजपा उम्मीदवार ने निर्णायक बढ़त हासिल कर ली।
चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी ने भवानीपुर में बड़े पैमाने पर वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने का आरोप लगाया था। उनका दावा था कि करीब 60,000 नाम हटाए गए हैं। करीब 2.6 लाख मतदाताओं वाले इस क्षेत्र में पहले भी मतदाता सूची में संशोधन हो चुके हैं, लेकिन इस बार यह मुद्दा चुनावी बहस का केंद्र बन गया।
इस हार के कई बड़े राजनीतिक संकेत हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह परिणाम आने वाले चुनावों में बंगाल की राजनीति को और अधिक प्रतिस्पर्धी बना सकता है।
ममता बनर्जी का ‘एक वोट से जीत’ वाला दावा इस चुनाव में टिक नहीं पाया। भवानीपुर जैसी सुरक्षित मानी जाने वाली सीट पर हार यह दिखाती है कि मतदाता का मूड अंतिम क्षणों में भी पूरी तरह बदल सकता है। यह नतीजा सिर्फ एक सीट की हार नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति में बदलते ट्रेंड का संकेत भी है, जिस पर आने वाले समय में सभी दलों की नजर रहेगी।
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