
TMC Crisis in West Bengal: बंगाल में चल रहे राजनीतिक बवाल ने उस समय अचानक नया मोड़ ले लिया, जब रविवार को तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों ने NCPI (Nationalist Citizens Party of India) को अपना नया ठिकाना बना लिया। यह पार्टी अब तक अनजान थी। इसका नाम शायद ही किसी ने बंगाल या देश में सुना हो। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह सिर्फ ममता बनर्जी की पार्टी की टूट नहीं है, बल्कि देश की संसद का गणित भी बदलने वाला है। इस पूरे घटनाक्रम का असर सीधे संसद के नंबर गेम पर पड़ सकता है। यही वजह है कि आगामी मानसून सत्र से पहले यह मामला और भी अहम हो गया है। आइए जानते हैं इससे आने वाले दिनों में देश की राजनीति पर क्या असर पड़ने वाला है...
रविवार, 14 जून को पहले टीएमसी के 19 बागी सांसद केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर पर जुटे। वहां से निकलते ही ये सीधे लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के आवास पहुंचे। सांसदों ने स्पीकर को चिट्ठी सौंपकर साफ कह दिया कि वे नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में शामिल हो रहे हैं और आने वाले समय में बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA गठबंधन को सपोर्ट करेंगे। इसके साथ ही उन्होंने संसद में विपक्षी (INDIA) गठबंधन से अलग बैठने की जगह भी मांग ली है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस घटनाक्रम का असर 21 जुलाई से शुरू होने वाले मॉनसून सत्र में दिखेगा। सरकार संसद में कुछ बहुत बड़े और कड़े संविधान संशोधन बिल लाने की तैयारी में है। इन बिलों को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। इससे पहले जब सरकार महिलाओं को 33% आरक्षण देने वाला 131वां संविधान संशोधन बिल लाई थी, तो वह लोकसभा में गिर गया था। तब पक्ष में 298 और विरोध में 238 वोट पड़े थे। तभी से कयास लग रहे थे कि बीजेपी नए साथियों की तलाश में है। अब TMC के इन 20 सांसदों के आने से बीजेपी के पास संसद शुरू होने से पहले ही एक बहुत बड़ा 'रणनीतिक फायदा' आ गया है।
विपक्षी खेमे में इस बात को लेकर कई तरह की चर्चाएं हैं कि क्या इस पूरे घटनाक्रम के पीछे BJP की कोई रणनीति रही है। कुछ नेताओं की बैठकों और मुलाकातों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि BJP लगातार इन आरोपों को खारिज करती रही है और उसका कहना है कि यह पूरी तरह TMC का अंदरूनी मामला है। फिलहाल इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन मामला इतना आसान भी नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राजनीति में हर कदम के साथ जोखिम भी जुड़ा होता है और इस मामले में भी कई सवाल अभी बाकी हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इन सांसदों का नया राजनीतिक रास्ता कानूनी रूप से पूरी तरह मान्य माना जाएगा या नहीं। कुछ कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले को चुनौती मिल सकती है। अगर मामला अदालत तक पहुंचता है तो लंबी कानूनी लड़ाई देखने को मिल सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम भूमिका लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की मानी जा रही है। उन्हें तय करना होगा कि बागी सांसदों की मांगों को किस रूप में देखा जाए। संसद में उनकी स्थिति क्या होगी और उन्हें अलग समूह के तौर पर मान्यता मिलेगी या नहीं, यह फैसला आगे की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।
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