मुंबई. आमतौर पर 60 साल की उम्र पार करते ही लोग एक आरामदायक रिटायरमेंट वाली ज़िंदगी चाहते हैं। लेकिन सबकी किस्मत और हालात एक जैसे नहीं होते। कुछ लोग बुढ़ापे में अपने बच्चों के साथ आराम से रहते हैं, तो कुछ को इस उम्र में भी अपनी रोज़ी-रोटी के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। मुंबई के 82 साल के मनसुख काका की कहानी कुछ ऐसी ही है, जो आज अपनी ईमानदारी और मेहनत से पूरे देश और खासकर युवाओं के लिए एक बड़ी मिसाल बन गए हैं।
मनसुख काका रोज़ मुंबई की एक भीड़-भाड़ वाली सड़क के फुटपाथ पर एक छोटा सा स्टॉल लगाते हैं। यहां वो घर पर बना 'फरसाण' (नमकीन और नाश्ते का सामान) बेचते हैं। इस उम्र में भी शरीर की थकान और कांपते हाथों की परवाह किए बिना, वो रोज़ 12 घंटे सड़क किनारे खड़े होकर काम करते हैं। इतनी मेहनत के बाद भी, किसी अच्छे दिन उनकी कमाई सिर्फ 300 रुपये हो पाती है। मुंबई की एक कंटेंट क्रिएटर, आराधना चटर्जी ने जब उनकी रोज़ की इस जद्दोजहद का वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर किया, तब जाकर काका की कहानी दुनिया के सामने आई।
कोविड महामारी के दौरान उनकी ज़िंदगी पूरी तरह से बदल गई। वो गंभीर रूप से बीमार पड़ गए, जिसकी वजह से उन्हें अपनी नौकरी गंवानी पड़ी। उन मुश्किल दिनों में, उनके बेटे को भी अपने पिता की देखभाल के लिए अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी। इतने बड़े आर्थिक झटके के बावजूद मनसुख काका ने हिम्मत नहीं हारी।
बीमारी से पूरी तरह ठीक होने के बाद, उन्होंने किसी के आगे हाथ फैलाने के बजाय खुद आत्मनिर्भर बनने का फैसला किया। काका की बहन रोज़ घर पर ही ताज़ा और स्वादिष्ट नाश्ता बनाती हैं। उसे अच्छी तरह पैक करके काका फुटपाथ पर बेचते हैं। वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि दादाजी कितनी सफ़ाई से इन-शर्ट करके एक प्रोफेशनल की तरह अपना काम कर रहे हैं।
इतना ही नहीं, वो दिन की हर बिक्री और खर्च का हिसाब एक छोटी सी डायरी में बड़ी पाबंदी से लिखते हैं। उनकी ये लगन और ईमानदारी लोगों का दिल जीत रही है। इंटरनेट पर यह वीडियो वायरल होते ही हज़ारों लोग दादाजी के सपोर्ट में आ गए हैं। जो लोग उनकी दुकान पर गए, उन्होंने काका को एक बहुत ही दयालु और विनम्र इंसान बताया। कई लोग मुंबई वालों से अपील कर रहे हैं कि वे काका की दुकान से ही नाश्ता खरीदें। लोग उनकी इस ज़िंदादिली और ज़िम्मेदारी को सलाम कर रहे हैं। मनसुख काका की कहानी इस बात का सबूत है कि उम्र सिर्फ एक नंबर है और अगर जीने का जज़्बा हो तो स्वाभिमान से ज़िंदगी जी जा सकती है।
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