ममता बनर्जी को टेंशन देने वाली NCPI की कुंडली: एक कमरे से चलती है, चुनाव में सिर्फ 822 वोट मिले

Published : Jun 15, 2026, 08:20 AM IST
NCPI Full Profile

सार

West Bengal Politics: TMC के 20 बागी सांसदों ने किस नई पार्टी को चुना है? NCPI का इतिहास और चुनाव में इसका प्रदर्शन कैसा रहा है? इस पार्टी को कौन चलाता है और इसका दफ्तर कहां है? इतने बड़े सांसदों ने इस छोटी सी गुमनाम पार्टी को क्यों चुना?

NCPI Full Profile: तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों का नया ठिकाना बनी NCPI (Nationalist Citizens Party of India) खूब सुर्खियों में है। जिस पार्टी का नाम देश के ज्यादातर लोगों ने कभी सुना ही नहीं था, वो अब अचानक से बंगाल से दिल्ली तक चर्चा में है। चौंकाने वाली बात यह है कि ममता बनर्जी के सांसदों ने जिस पार्टी को चुना है, उसे चुनाव में सिर्फ 822 वोट मिले थे। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि ममता दीदी को टेंशन देने वाली यह पार्टी किसकी है, बागी सांसदों ने इसी पार्टी में जाना क्यों चुना? जानिए NCPI की पूरी कुंडली और अंदर की कहानी...

NCPI क्या है?

NCPI एक छोटी राजनीतिक पार्टी है, जिसे साल 2023 की शुरुआत में चुनाव आयोग के साथ रजिस्टर्ड किया गया था। इस पार्टी को कुल डोनेशन सिर्फ 1.13 लाख रुपए मिला था। पार्टी का नाम तो बड़ा है, लेकिन इसका राजनीतिक प्रभाव लंबे समय तक बेहद सीमित रहा। हालांकि, अब हालात बदल चुके हैं। टीएमसी के अंदर उठे सियासी तूफान ने इस छोटी पार्टी को अचानक राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

NCPI का दफ्तर कहां और कर्ता-धर्ता कौन हैं?

पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के बानीपुर इलाके में एक छोटा सा कमरा है। यही इस नेशनल लेवल की हलचल मचाने वाली पार्टी का दफ्तर है। मजेदार बात यह है कि इसी एक पते पर एक सामाजिक संस्था और एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी भी रजिस्टर्ड है। इस पार्टी के प्रेसिडेंट उत्तिय कुंडू हैं और इसकी ट्रेजरर (कोषाध्यक्ष) उनकी पत्नी श्युली कुंडू हैं।

NCPI को चुनाव में मिले सिर्फ 822 वोट

बंगाल की पार्टी होने के बावजूद इसने अपना पहला दांव त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में आजमाया। 7 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, जिनमें से 4 के फॉर्म रिजेक्ट हो गए। जो बचे, उन्हें पूरी पार्टी मिलाकर सिर्फ 822 वोट मिले। त्रिपुरा में NCPI के टिकट पर चुनाव लड़ चुके जहांगीर अली और बार्जेदा त्रिपुरा ने मीडिया से बातचीत में बताया कि 'कोलकाता से श्युली कुंडू आई थीं और हमें उम्मीदवार बनाया था। चुनाव में कोई खास प्रचार नहीं हुआ और न ही हमसे कोई पैसे लिए गए। लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म हुआ, वे लोग बोरिया-बिस्तर समेटकर वापस कोलकाता भाग गए। उसके बाद से हमारा उनसे कोई संपर्क नहीं हुआ।'

TMC के बागी और 20 बड़े सांसदों ने NCPI को ही क्यों चुना?

दलबदल कानून से बचना

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर सांसद सीधे अपनी नई पार्टी बनाते, तो दल-बदल के कानूनी दिक्कतों (Anti-Defection Law) में फंस सकते थे। किसी पहले से रजिस्टर्ड पार्टी में विलय करने से उनकी संसद सदस्यता सेफ रहती है।

संसद में अलग ग्रुप

राजनीतिक जानकार बताते हैं कि टीएमसी के इन बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मिलकर संसद में अपने लिए अलग बैठने की व्यवस्था और एक अलग संसदीय दल के रूप में मान्यता देने की मांग की है।

 

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