Nepal Flood: अपनों की राख तक नहीं मिली! 4800 परिवारों पर अब टूट सकता है नया संकट

Published : Sep 02, 2026, 05:32 PM IST
Nepal Floods

सार

Nepal Flood Crisis: नेपाल में शवों को जलाने के बजाय दफनाया जा रहा है। जानिए 'मास ग्रेव्स' के पीछे की मजबूरी और 4800 लापता परिवारों का नया कानूनी संकट क्या आ सकता है।

Nepal Missing People Crisis: नेपाल में 26 अगस्त को आई अचानक बाढ़ ने हजारों परिवारों की जिंदगी बदल दी। किसी ने अपना घर खोया, किसी ने रोजी-रोटी, तो कई परिवार ऐसे हैं जिन्हें आज तक यह पता नहीं कि उनके अपने जिंदा हैं या नहीं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, बाढ़ में 1127 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 4800 से ज्यादा लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। सबसे बड़ा दर्द उन परिवारों का है, जिन्हें न अपने परिजन का शव मिला और न ही अंतिम संस्कार की आखिरी रस्म पूरी करने का मौका। दूसरी तरफ, बाढ़ में मिले कई शवों की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि उनकी पहचान करना मुश्किल है। ऐसे में नेपाल प्रशासन अज्ञात शवों को दफना रहा है, ताकि बाद में DNA जांच के जरिए उनकी पहचान की जा सके। यानी बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी हजारों परिवारों का इंतजार खत्म नहीं हुआ है।

नेपाल में जलाने की बजाय दफनाएं क्यों जा रहे शव?

नेपाल के अस्पतालों और मुर्दाघरों में अब पैर रखने तक की जगह नहीं बची है। राहत दलों को मलबे और कीचड़ से जो शव मिल रहे हैं, उनकी हालत बेहद दर्दनाक है। पानी और मलबे में कई दिनों तक दबे रहने के कारण ज्यादातर शव पूरी तरह फूल चुके हैं और तेजी से खराब हो रहे हैं। किसी का चेहरा देखकर पहचानना अब नामुमकिन हो चुका है। अगर इन अज्ञात शवों को जला दिया जाए, तो उनकी पहचान हमेशा के लिए मिट जाएगी। इसी मजबूरी के चलते प्रशासन शवों का दाह संस्कार करने के बजाय उन्हें सामूहिक कब्रों में दफना रहा है। दफनाने से पहले हर शव का डीएनए (DNA) सैंपल सुरक्षित रखा जा रहा है और कब्रों का बाकायदा नंबर दर्ज हो रहा है। इसका मकसद है कि अगर कभी भी कोई परिवार अपने लापता सदस्य को ढूंढ़ने आए, तो डीएनए मैच कराकर उन्हें अपने अपने की पुष्टि की जा सके।

नेपाल बाढ़ में लापता 4800 परिवारों के सामने कौन-सा नया संकट?

न शव मिला, न डेथ सर्टिफिकेट

कानूनी नियम के अनुसार, जब तक शव नहीं मिलता या उसकी कानूनी पहचान नहीं होती, तब तक डेथ सर्टिफिकेट (Death Certificate) जारी नहीं हो सकता है।

अटक सकते हैं बैंक खाते और जमा पूंजी

जिन परिवारों के कमाने वाले सदस्य लापता हैं, उनके बैंक अकाउंट फ्रीज हो सकते हैं। परिवार को अपनी ही मेहनत की गाढ़ी कमाई निकालने में परेशानी आ सकती है।

मुआवजा और इंश्योरेंस करना पड़ सकता है लंबा इंतजार

सरकार की तरफ से मिलने वाली राहत राशि हो या जीवन बीमा (Life Insurance) का क्लेम, बिना डेथ सर्टिफिकेट के कोई भी कागजी कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकती। ऐसे में अगर सरकार कोई रास्ता नहीं निकालती, तो इन परिवारों के सामने नया संकट आ सकता है।

सुरंगों में दबी उम्मीदें

हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स की गहरी सुरंगों में फंसे सैकड़ों कामगारों के परिजन आज भी इस पशोपेश में हैं कि वे जिंदा बचने की उम्मीद करें या उनके अंतिम संस्कार की रस्मों की तैयारी।

नेपाल में डेथ सर्टिफिकेट का कानूनी नियम क्या कहता है?

नेपाल में जन्म, मृत्यु और अन्य व्यक्तिगत घटना (Mrityu Darta Praman Patra) रजिस्ट्रेशन एक्ट 2033 (1976) अधिनियम की धारा 4 और 5 और 'स्थानीय सरकार संचालन ऐन 2074' किसी भी व्यक्ति की मौत की आधिकारिक रिपोर्ट दर्ज कराना अनिवार्य है। इस नियम के अनुसार, किसी भी व्यक्ति की मौत के 35 दिनों के अंदर स्थानीय वार्ड कार्यालय से 'मृत्यु दर्ता प्रमाण पत्र' बनवाना अनिवार्य होता है। इसके लिए मृतक का नागरिकता प्रमाण पत्र और पुलिस या अस्पताल की रिपोर्ट जरूरी होती है। बिना इस प्रमाण पत्र के मुलुकी देवानी संहिता 2074 के तहत न तो बैंक से पैसे निकल सकते हैं और न ही जमीन या बीमा क्लेम परिजनों को मिल सकता है। यही वजह है कि मलबे में लापता 4,800 लोगों के परिवारों के सामने आर्थिक और कानूनी तौर पर हाथ बंध जाने का बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।

नेपाल बाढ़ में भारत ने क्या मदद की?

  • इस भयानक मानवीय त्रासदी में भारत अपने पड़ोसी देश के साथ पूरी मजबूती से खड़ा है। भारत सरकार अब तक राहत सामग्री की 5 खेप नेपाल भेज चुकी है। इनके जरिए करीब 68.5 टन जरूरी सामान, दवाइयां, टेंट और राशन नेपाल पहुंचाया गया है।
  • मलबे और बंद सुरंगों में फंसे लोगों को तलाशने के लिए 11 सदस्यीय स्पेशल रेस्क्यू टीम भी आधुनिक लाइफ-डिटेक्टिंग उपकरणों के साथ ग्राउंड पर दिन-रात जुटी हुई है।
  • दूसरी ओर गंडक (नारायणी) नदी में बहकर उत्तर प्रदेश की सीमा में आ रहे शवों को भी भारतीय प्रशासन पूरी संवेदनशीलता के साथ नेपाल पुलिस को सौंप रहा है।

नेपाल में क्या सिस्टम की लापरवाही से आया बाढ़?

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में माना है कि हिमालय में बढ़ता तापमान (1.8 डिग्री का उछाल) और तेजी से पिघलते ग्लेशियर इस आपदा की सबसे बड़ी जड़ हैं। लेकिन स्थानीय लोगों का दर्द यह भी है कि ग्लेशियर टूटने के करीब 38 मिनट बाद अलर्ट मिला। अगर यह अलार्म कुछ मिनट पहले बज गया होता, तो शायद सैकड़ों लोग आज जिंदा होते।

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