
Netanyahu-Trump Rift: अमेरिका-इजराइल हमेशा पक्के दोस्त माने जाते हैं। लेकिन ईरान से हुई अमेरिकी डील के बाद डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के रिश्तों में दरार आती दिख रही है। ट्रंप खुलेआम कह चुके हैं कि "मेरे बिना इजरायल का अस्तित्व नहीं होता।" इतना ही नहीं, उन्होंने नेतन्याहू को 'क्रेजी' और गैर-जिम्मेदार तक बताया है। दूसरी ओर, नेतन्याहू ऐसे फैसले लेते दिख रहे हैं जो ट्रंप की ईरान नीति को मुश्किल में डाल सकते हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या दोनों नेताओं के रिश्तों में सचमुच दरार आ गई है या फिर इसके पीछे कोई बड़ी रणनीति काम कर रही है?
कुछ महीने पहले तक तस्वीर बिल्कुल अलग थी। जून 2025 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने ईरान पर अपने परमाणु दायित्वों के उल्लंघन का आरोप लगाया। इसके तुरंत बाद इजरायल ने "ऑपरेशन राइजिंग लॉयन" शुरू किया। 13 जून 2025 को ईरान के कई सैन्य और परमाणु ठिकानों पर बड़े हमले किए गए। तेहरान भी इन हमलों के निशाने पर था। शुरुआत में यह पूरी तरह इजरायली सैन्य अभियान माना गया, लेकिन जल्द ही अमेरिका भी इसमें शामिल हो गया। उस समय यह चर्चा थी कि ट्रंप ईरान पर सीधे हमले के पक्ष में नहीं हैं और नेतन्याहू से नाराज चल रहे हैं। लेकिन 22 जून 2025 को अमेरिका ने 'ऑपरेशन मिडनाइट हैमर' शुरू कर दिया। अमेरिकी बी-2 स्टील्थ बॉम्बर्स ने ईरान की प्रमुख परमाणु सुविधाओं नतांज, फोर्डो और इस्फहान पर शक्तिशाली बंकर बस्टर बम गिराए। इन घटनाओं के बाद दुनिया को लगा कि ट्रंप और नेतन्याहू पूरी तरह एक ही रणनीति पर काम कर रहे हैं।
इसके बाद फरवरी 2026 में ईरान के भीतर विरोध प्रदर्शनों और सरकारी कार्रवाई के बीच अमेरिका और इजरायल ने एक और संयुक्त सैन्य अभियान चलाया। रिपोर्ट्स के अनुसार, महज 12 घंटों के भीतर 900 से ज्यादा हमले किए गए। इस अभियान में ईरान की एयर डिफेंस सिस्टम को भारी नुकसान पहुंचा। कई सैन्य ठिकाने तबाह हो गए और ईरानी नेतृत्व को भी बड़ा झटका लगा। उस समय यह माना गया कि ट्रंप और नेतन्याहू का गठबंधन पहले से भी ज्यादा मजबूत हो गया है। लेकिन इसी दौर के बाद दोनों नेताओं की प्राथमिकताओं में अंतर दिखाई देने लगा।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि असली समस्या ईरान को लेकर दोनों नेताओं की सोच में नहीं, बल्कि उनके अंतिम लक्ष्य में है। ट्रंप की प्राथमिकता अब युद्ध को खत्म करना और किसी बड़े समझौते तक पहुंचना है। उनके सामने अमेरिका की घरेलू राजनीति, बढ़ती ईंधन कीमतें, युद्ध से थकी जनता और आने वाले चुनाव जैसी चुनौतियां हैं। ट्रंप चाहते हैं कि ईरान के साथ कोई बड़ा समझौता हो जाए, ताकि वे उसे अपनी विदेश नीति की बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर सकें। वहीं, नेतन्याहू का मानना है कि ईरान को केवल बातचीत के जरिए नहीं रोका जा सकता। वे लगातार दबाव और सैन्य कार्रवाई के पक्षधर दिखाई देते हैं। यानी दोनों नेताओं का विरोधी भले ही एक हो, लेकिन उसे लेकर उनकी मंजिलें अलग-अलग होती नजर आ रही हैं।
पिछले कुछ हफ्तों में इजरायल ने लेबनान में हिजबुल्लाह से जुड़े कई ठिकानों पर हमले किए। अमेरिकी अधिकारियों को चिंता थी कि इन कार्रवाइयों से ईरान के साथ चल रही बातचीत प्रभावित हो सकती है। इसी दौरान ट्रंप ने पहली बार सार्वजनिक रूप से नेतन्याहू की आलोचना शुरू की। जी-7 सम्मेलन में उन्होंने कहा कि उन्होंने नेतन्याहू से साफ शब्दों में कहा है कि उन्हें हालिया कदम पसंद नहीं आए। इसके बाद ट्रंप का एक और बयान काफी चर्चा में रहा। उन्होंने कहा, "मेरे बिना इजरायल नहीं होता।" इस बयान की अमेरिका में भी आलोचना हुई। कई यहूदी संगठनों और राजनीतिक समूहों ने इसे अहंकारी और अनुचित बताया।
मिडिल-ईस्ट की पॉलिटिक्स पर नजर रखने वाले कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप की नाराजगी पूरी तरह वास्तविक नहीं भी हो सकती। उनका कहना है कि ट्रंप अक्सर एक कारोबारी और सौदेबाज नेता की तरह काम करते हैं। जब भी वह किसी महत्वपूर्ण समझौते के करीब पहुंचते हैं, तब दबाव बनाने के लिए सार्वजनिक बयानबाजी का इस्तेमाल करते हैं। विशेषज्ञों का तर्क है कि ईरान को यह संदेश देना कि अमेरिका और इजरायल के बीच मतभेद हैं, बातचीत की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। इससे तेहरान को यह संकेत मिलता है कि ट्रंप शांति समझौते के लिए गंभीर हैं और जरूरत पड़ने पर नेतन्याहू को भी कंट्रोल कर सकते हैं।
यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप और नेतन्याहू के रिश्तों में तनाव की खबरें सामने आई हों। पिछले साल भी कई मौकों पर दोनों नेताओं के बीच रणनीतिक मतभेद देखने को मिले थे। उस समय ट्रंप संघर्ष को सीमित रखना चाहते थे, जबकि नेतन्याहू अधिक आक्रामक रुख अपनाने के पक्ष में दिखाई दिए थे। हालांकि बाद में दोनों नेता फिर एक मंच पर साथ नजर आए। यही वजह है कि मौजूदा विवाद को लेकर भी विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। कुछ इसे वास्तविक राजनीतिक मतभेद मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे ईरान के साथ संभावित समझौते की रणनीति का हिस्सा बता रहे हैं। फिलहाल इतना तय है कि ट्रंप और नेतन्याहू के रिश्तों में पहले जैसी सहजता दिखाई नहीं दे रही। आने वाले समय में ईरान को लेकर दोनों देशों की नीतियां यह तय करेंगी कि यह दूरी स्थायी है या सिर्फ एक राजनीतिक रणनीति।
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