
बेंगलुरु/नई दिल्ली: प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय चक्रव्यूह का पर्दाफाश किया है जिसने भारत की आंतरिक सुरक्षा और बैंकिंग रेगुलेटरी सिस्टम को हिलाकर रख दिया है। एक अमेरिकी गैर-सरकारी संगठन (NGO) 'द टिमोथी इनिशिएटिव' (TTI) द्वारा संचालित इस बेहद परिष्कृत क्रॉस-बॉर्डर नेटवर्क के जरिए बिना किसी कानूनी अनुमति और जांच के करीब 95 करोड़ रुपये की विदेशी फंडिंग को भारतीय धरती पर खपाया गया। इस पूरे खेल में अमेरिकी बैंकों के डेबिट कार्ड्स और एक ही भारतीय नाम का ऐसा इस्तेमाल किया गया, जिसने वित्तीय खुफिया एजेंसियों के भी होश उड़ा दिए हैं।
इस अंतरराष्ट्रीय साजिश के तार तब खुलने शुरू हुए जब सुरक्षा एजेंसियों ने बेंगलुरु के केम्पेगौड़ा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर 'माइका मार्क' नामक एक संदिग्ध वित्तीय ऑपरेटर को दबोचा। जब उसके सामान की तलाशी ली गई, तो जांच अधिकारी सन्न रह गए। उसके पास से अमेरिका के Truist Bank द्वारा जारी किए गए 24 विदेशी डेबिट कार्ड बरामद हुए। जांच आगे बढ़ी तो इस नेटवर्क के वित्तीय प्रमुख अजीत वर्गीज मथाई के ठिकानों पर छापेमारी की गई। वहां से न केवल 37 लाख रुपये की बेहिसाब नकदी (ज्यादातर 500 के नोट) बरामद हुई, बल्कि "अजीत मथाई-द टिमोथी इनिशिएटिव" के नाम से जुड़ा एक कॉर्पोरेट डेबिट कार्ड भी हाथ लगा। जांचकर्ताओं का दावा है कि साल 2019 से अब तक इस खुफिया व्यवस्था के तहत भारत में 1,000 से अधिक अमेरिकी डेबिट कार्ड अवैध रूप से बांटे जा चुके हैं।
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ED की जांच में जो सबसे चौंकाने वाला और सस्पेंसिव मोड़ आया, वह था पहचान छिपाने का एक अनोखा तरीका। जांच अधिकारियों के मुताबिक, TTI के फाइनेंस हेड अजीत मथाई के सीधे आदेश पर 'संतोष कुमार' नाम से कम से कम 23 अलग-अलग अमेरिकी डेबिट कार्ड छापे गए थे। "यह एक अच्छी तरह से सोची-समझी आपराधिक साजिश थी। एक ही आम भारतीय नाम 'संतोष कुमार' के कार्ड्स छापने का एकमात्र मकसद असली पैसा निकालने वालों की पहचान को पूरी तरह से गुप्त रखना और 'नो योर कस्टमर' (KYC) सुरक्षा जांच से बचना था।" हैरानी की बात यह है कि ये कार्ड उन लोगों के हाथों में थमा दिए गए थे, जो वास्तव में उस अमेरिकी बैंक के खाताधारक (Account Holders) थे ही नहीं। नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच ही इस तरीके से लगभग 92.55 करोड़ रुपये (9.99 मिलियन USD) भारत में इस्तेमाल किए गए, जबकि जनवरी 2024 से मार्च 2026 के बीच भारतीय ATM से करीब 44 करोड़ रुपये की नकद निकासी की जा चुकी थी।
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ED के अधिकारियों के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय केवल यह अवैध पैसा नहीं है, बल्कि इस पैसे का डेस्टिनेशन (मंजिल) है। वित्तीय उल्लंघनों से आगे बढ़कर जब जांच की कड़ियां जोड़ी गईं, तो इसके तार छत्तीसगढ़ के बस्तर और धमतरी जैसे संवेदनशील इलाकों से जुड़े मिले। इन क्षेत्रों में, जो ऐतिहासिक रूप से वामपंथी उग्रवाद (LWE) या नक्सली गतिविधियों से प्रभावित रहे हैं, इस नेटवर्क के जरिए लगभग 6.34 करोड़ रुपये की संदिग्ध और बार-बार होने वाली ATM निकासी दर्ज की गई है। केंद्रीय जांच एजेंसियां अब इस बात की गहराई से तफ्तीश कर रही हैं कि क्या इस गुप्त नकदी का इस्तेमाल देश विरोधी ताकतों को हवा देने के लिए किया जा रहा था।
जांच के मुताबिक, 'द टिमोथी इनिशिएटिव' के ऑपरेशन्स हेड जोनाथन एस राजन और उनकी टीम ने एक ऐसा गुप्त ढांचा तैयार किया था, जो भारत की वित्तीय निगरानी व्यवस्था (Financial Surveillance) के रडार से पूरी तरह बाहर था। इस अंडरग्राउंड फंडिंग का इस्तेमाल सुनियोजित प्रचार, ट्रेनिंग प्रोग्राम और वैचारिक पहुंच के जरिए सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े और कमजोर समुदायों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा था। पिछड़े इलाकों की आर्थिक लाचारी का फायदा उठाकर यह संगठन अपनी पैठ बना रहा था और इसके लिए फंड सीधे अमेरिकी ATM कार्ड्स के जरिए बिना किसी सरकारी रिकॉर्ड के भारतीय बाजारों में आ रहा था। ED फिलहाल इस पूरे सिंडिकेट के अंतिम छोर तक पहुंचने और इससे फायदा उठाने वाले मास्टरमाइंड्स का पता लगाने के लिए कड़ाई से पूछताछ कर रही है। आने वाले दिनों में इस केस में कई और बड़े नामों के खुलासे होने की उम्मीद है।
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