
कभी-कभी जिंदगी में एक छोटा सा बदलाव किसी परिवार की पूरी दुनिया बदल देता है। उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के पांच वर्षीय प्रियांश की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। जिस उम्र में बच्चे बेफिक्र होकर मैदान में दौड़ते और खेलते हैं, उस उम्र में प्रियांश अपने हमउम्र बच्चों को दूर खड़े होकर देखा करता था। जन्मजात दिव्यांगता के कारण उसका एक पैर छोटा था, जिससे चलना-फिरना भी उसके लिए आसान नहीं था।
हर दिन उसके लिए एक नई चुनौती लेकर आता था। दोस्तों को खेलते देखकर उसके मन में भी दौड़ने और उनके साथ खेलने की इच्छा होती थी, लेकिन शारीरिक परेशानी उसे पीछे रोक देती थी। यह स्थिति केवल प्रियांश के लिए ही नहीं, बल्कि उसके माता-पिता के लिए भी चिंता का कारण बनी हुई थी।
अपने बेटे को सामान्य जीवन देने की उम्मीद में परिवार ने कई अस्पतालों और विशेषज्ञों से संपर्क किया। हालांकि लंबे समय तक उन्हें कोई ऐसा समाधान नहीं मिला, जिससे प्रियांश की जिंदगी में वास्तविक बदलाव आ सके। इसी बीच सोशल मीडिया के जरिए परिवार को नारायण सेवा संस्थान के बारे में जानकारी मिली। नई उम्मीद के साथ परिवार जून के पहले सप्ताह में संस्थान पहुंचा, जहां विशेषज्ञ चिकित्सकों ने प्रियांश की विस्तृत जांच की।
चिकित्सकीय परीक्षण के बाद 9 जून को प्रियांश को जापान और जर्मन तकनीक से विकसित अत्याधुनिक 3-डी प्रिंटेड नारायण मॉड्यूलर आर्टिफिशियल लिम्ब उपलब्ध कराया गया। यह सिर्फ एक कृत्रिम अंग नहीं था, बल्कि उसके लिए आत्मनिर्भरता की नई शुरुआत साबित हुआ। कृत्रिम अंग लगाने के बाद प्रियांश की दिनचर्या पूरी तरह बदल गई। अब वह पहले की तुलना में अधिक सहजता से खड़ा हो सकता है, चल सकता है और स्कूल भी नियमित रूप से जाने लगा है।
सबसे बड़ा बदलाव उसके आत्मविश्वास में देखने को मिला है। जो बच्चा कभी मैदान के किनारे खड़ा होकर दूसरों को खेलते देखता था, वह आज अपने दोस्तों के साथ दौड़ता, खेलता और बचपन के हर पल का आनंद ले रहा है। प्रियांश की मुस्कान उसके माता-पिता के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं है। वर्षों की चिंता और संघर्ष के बाद आज उनका बेटा सामान्य बच्चों की तरह जिंदगी जीने की ओर बढ़ रहा है।
प्रियांश की कहानी केवल एक बच्चे के जीवन में आए बदलाव की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन परिवारों के लिए भी प्रेरणा है जो किसी शारीरिक चुनौती से जूझ रहे हैं। सही समय पर मिली तकनीक, विशेषज्ञों का सहयोग और परिवार का अटूट विश्वास किसी भी कठिन परिस्थिति को नई उम्मीद में बदल सकता है। आज प्रियांश आत्मविश्वास से कहता है, "मैं भी दौड़ सकता हूं।" यही उसकी सबसे बड़ी जीत है।
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