
बेंगलुरु: कर्नाटक की सियासत में भूचाल लाने वाले 72 वर्षीय वरिष्ठ नेता आर. रामलिंगा रेड्डी इस वक्त देश की राजनीति के सबसे बड़े केंद्र बिंदु बन चुके हैं। दो दिन पहले मुस्कुराते हुए मंत्री पद की शपथ लेने वाले रेड्डी ने अचानक इस्तीफा देकर पूरी कांग्रेस आलाकमान को संकट में डाल दिया है। लेकिन क्या यह सिर्फ एक साधारण पोर्टफोलियो (विभाग) का विवाद है, या फिर बेंगलुरु की सत्ता पर एकाधिकार जमाने की कोई बहुत बड़ी अंदरूनी जंग? कूटनीतिक गलियारों में यह सवाल तैर रहा है कि आखिर बेंगलुरु में कांग्रेस के सबसे मजबूत स्तंभ माने जाने वाले इस नेता को ऐसा आत्मघाती कदम उठाने पर किसने मजबूर किया?
#WATCH | Bengaluru | Ramalinga Reddy resigns as Karnataka Minister, says, "I am still in the Congress party; I have not resigned from the party. I have been in the Congress party for the past 53 years. I have handled several responsibilities within the party.I have served as a… pic.twitter.com/5SnASNSpJl
— ANI (@ANI) June 5, 2026
इस सियासी ड्रामे के सस्पेंस को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्ने पलटने होंगे। 1953 में जन्मे रामलिंगा रेड्डी ने छात्र संगठन NSUI के जरिए सक्रिय राजनीति में कदम रखा था। वे कोई ऐसे-वैसे नेता नहीं हैं, बल्कि पिछले 5 दशकों से कांग्रेस की रीढ़ की हड्डी रहे हैं। 1989 में पहली बार विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
वर्तमान में बीटीएम लेआउट (BTM Layout) निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले रेड्डी कर्नाटक के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले विधायकों में से एक हैं। उन्होंने वीरप्पा मोइली से लेकर सिद्धारमैया सरकार तक में खाद्य, नागरिक आपूर्ति, शिक्षा, परिवहन और बेहद संवेदनशील माने जाने वाले 'गृह मंत्रालय' जैसे बड़े विभागों को संभाला है। उनकी बेटी सौम्या रेड्डी भी वर्तमान में कर्नाटक महिला कांग्रेस की प्रमुख हैं, जो इस परिवार की गहरी राजनीतिक पैठ को दर्शाता है। ऐसे में इतने कद्दावर चेहरे का अचानक बागी हो जाना किसी बड़े विस्फोट से कम नहीं है।
परदे के पीछे छिपे असली सस्पेंस की परतें तब खुलीं जब विभागों के बंटवारे की लिस्ट सामने आई। अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, साल 2023 के सत्ता समझौते के दौरान राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे की मौजूदगी में रेड्डी से एक 'सीक्रेट' वादा किया गया था। वादा यह था कि जब ढाई साल बाद डी.के. शिवकुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालेंगे, तो बेंगलुरु शहर की कमान और 'बेंगलुरु विकास विभाग' रामलिंगा रेड्डी को सौंपा जाएगा।
लेकिन शुक्रवार को जब अंतिम लिस्ट आई, तो रेड्डी के पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्हें शहर के विकास से दूर करते हुए 'प्रमुख और मध्यम सिंचाई विभाग' थमा दिया गया। हालांकि सिंचाई विभाग अपने आप में बहुत बड़ा है, लेकिन रेड्डी इसे अपने राजनीतिक कद और 'बेंगलुरु के चेहरे' के रूप में अपनी पहचान पर एक बड़ा आघात मान रहे हैं। रेड्डी ने भावुक होकर कहा, "मुझे बार-बार अपमानित किया गया है। आलाकमान के आश्वासनों पर भरोसा करने का मुझे यह सिला मिला।"
इस इस्तीफे ने पूरी सरकार की नींद उड़ा दी है। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार तुरंत फ्रंट फुट पर आए और रेड्डी को अपना 'बहुत अच्छा दोस्त' बताते हुए डैमेज कंट्रोल में जुट गए। उन्होंने भरोसा जताया है कि वे बंद कमरे में बैठकर इस असंतोष को सुलझा लेंगे।
#WATCH | Bengaluru | On Ramalinga Reddy resigning as Karnataka Minister, state CM DK Shivakumar says, "Nothing to worry. He is a great friend. We are the closest friends among the Cabinet. We will sort out the problem." pic.twitter.com/AQOQW2QQfY
— ANI (@ANI) June 5, 2026
दूसरी तरफ, विपक्ष (बीजेपी) ने इस मौके को लपकने में जरा भी देर नहीं की। बीजेपी ने चुटकी लेते हुए कहा कि यह कांग्रेस की आंतरिक कलह का नतीजा है और जो सरकार अपने सबसे वरिष्ठ नेता को संभाल नहीं सकती, वह राज्य क्या चलाएगी? 'ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी' में होने वाले आगामी बड़े सुधारों के बीच रेड्डी का यह इस्तीफा डी.के. शिवकुमार की नई नवेली सरकार के लिए 'बवाल-ए-जान' बन चुका है। क्या शिवकुमार अपने इस पुराने दोस्त को मनाकर कैबिनेट में वापस ला पाएंगे, या कर्नाटक कांग्रेस की यह दरार किसी नए सियासी ड्रामे की शुरुआत है? जवाब आने वाले कुछ घंटों में बेंगलुरु की सड़कों पर दिखने वाला है।
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