
दिल्ली में पढ़ने का सपना लेकर आने वाला छात्र अक्सर यूनिवर्सिटी के एडमिशन और फीस का हिसाब तो पहले कर लेता है, लेकिन रहने की सुरक्षा का सवाल बहुत बाद में सामने आता है। सत्य निकेतन में बिल्डिंग हादसे में सात लोगों की मौत, जिनमें पांच छात्र बताए गए हैं, ने इसी छिपी हुई समस्या को अचानक सामने ला दिया है।
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि जिस इमारत में हादसा हुआ, उसमें सुरक्षा नियमों का पालन हुआ था या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी जैसे बड़े संस्थान के हजारों छात्रों के पास सुरक्षित और पर्याप्त हॉस्टल विकल्प आखिर क्यों नहीं हैं?
दिल्ली यूनिवर्सिटी से करीब 90 कॉलेज जुड़े हैं, लेकिन इनमें से लगभग 20 कॉलेजों के पास ही अपना हॉस्टल बताया जाता है। यानी बड़ी संख्या में छात्रों को कैंपस से बाहर रहना पड़ता है। DU के हॉस्टल का इतिहास भी काफी पुराना है। यूनिवर्सिटी और उसके कॉलेजों के सबसे ज्यादा हॉस्टल 1948 से लेकर 1970 के दशक के बीच बने। उस दौर में DU से जुड़े कॉलेजों की संख्या आज की तुलना में काफी कम थी। तब भी करीब 5 फीसदी छात्रों को ही हॉस्टल सुविधा मिल पाती थी। आज छात्रों की संख्या और शहर की जरूरत दोनों बदल चुके हैं, लेकिन हॉस्टल क्षमता उस गति से नहीं बढ़ी।
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यहां समस्या सिर्फ बजट की नहीं है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के ज्यादातर कॉलेज पहले से विकसित और घनी आबादी वाले इलाकों में स्थित हैं। नई हॉस्टल बिल्डिंग के लिए जमीन तलाशना अपने आप में बड़ी चुनौती है।
DDA से जमीन हासिल करने की प्रक्रिया, पुरानी इमारतों को हटाने की कानूनी जटिलताएं और निर्माण से पहले अलग-अलग विभागों से मंजूरी, इन सबमें लंबा समय लग सकता है। इसके अलावा हॉस्टल परियोजनाओं को DDA, पर्यावरण और बागवानी समेत कई स्तरों की अनुमति की जरूरत पड़ सकती है। सरकारी फंडिंग पर निर्भर परियोजनाओं में भी कागजी प्रक्रिया पूरी होने में समय लगता है। नतीजा यह है कि नई हॉस्टल योजनाओं की जरूरत तो लगातार बनी रहती है, लेकिन कई परियोजनाएं निर्माण या मंजूरी की प्रक्रिया से आगे नहीं बढ़ पातीं।
यही वह जगह है जहां यूनिवर्सिटी का हॉस्टल संकट सीधे PG और किराये की इमारतों से जुड़ जाता है। बाहर से दिल्ली पढ़ने आने वाला छात्र आम तौर पर PG या किराये का कमरा तलाशता है। वह किराया देता है, पहचान संबंधी दस्तावेज देता है और मकान मालिक या PG संचालक की शर्तें मानता है। लेकिन एक अहम जानकारी अक्सर उसके सामने नहीं होती—जिस बिल्डिंग में वह रहने जा रहा है, उसकी आखिरी सुरक्षा जांच कब हुई थी?
क्या वहां फायर सेफ्टी की व्यवस्था है? आपात स्थिति में बाहर निकलने का रास्ता कहां है? इमारत में कितने लोगों के रहने की अनुमति है? बिजली का लोड कितना है? बिल्डिंग का निर्माण स्वीकृत नक्शे के मुताबिक हुआ है या नहीं? छात्रों के सामने इन सवालों के स्पष्ट जवाब न होना एक गंभीर सुरक्षा खाई की ओर इशारा करता है।
सत्य निकेतन जैसी घटना के बाद आमतौर पर सवाल अवैध निर्माण, कमजोर ढांचे या नियमों के उल्लंघन तक सीमित हो जाते हैं। लेकिन छात्र आवास के मामले में समस्या इससे कहीं बड़ी है। जब संस्थागत हॉस्टल पर्याप्त नहीं होते, तो छात्रों की निर्भरता निजी PG और किराये की इमारतों पर बढ़ती है। ऐसे में सुरक्षा मानकों की निगरानी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है जितनी नई हॉस्टल क्षमता तैयार करना। यानी समाधान सिर्फ हादसे के बाद कार्रवाई करना नहीं, बल्कि हादसा होने से पहले ऐसी इमारतों की पहचान और नियमित जांच करना भी होना चाहिए।
सत्य निकेतन हादसा अगर सिर्फ एक इमारत की जांच तक सीमित रह गया तो इससे मूल समस्या का समाधान नहीं होगा। दिल्ली में छात्र आवास की वास्तविक स्थिति का व्यापक आकलन जरूरी है। DU और उसके कॉलेजों के हॉस्टल की क्षमता, लंबित परियोजनाओं और निर्माण की स्थिति के साथ-साथ उन इलाकों में छात्र-बहुल PG और किराये की इमारतों की सुरक्षा व्यवस्था की भी समीक्षा होनी चाहिए। क्योंकि किसी छात्र के लिए दिल्ली में कमरा सिर्फ रहने की जगह नहीं है। वह उसके पढ़ाई के वर्षों का घर होता है। एडमिशन मिलने के बाद सुरक्षित छत मिलना भी शिक्षा व्यवस्था का ही हिस्सा है।
सत्य निकेतन का हादसा अब यही सवाल छोड़ गया है, क्या दिल्ली छात्रों को सिर्फ कॉलेज की सीट दे रही है, या उनके लिए सुरक्षित रहने की जगह की जिम्मेदारी भी तय करेगी?
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