शहजाद पूनावाला के इस्तीफे ने खोला राजनीति का बड़ा राज, पार्टी प्रवक्ता बनकर भी क्यों नहीं मिलती सैलरी?

Published : Aug 19, 2026, 03:32 PM ISTUpdated : Aug 19, 2026, 03:38 PM IST
Shehzad Poonawalla

सार

Political Party Spokesperson Salary: शहजाद पूनावाला के इस्तीफे ने बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या किसी राजनीति पार्टी का प्रवक्ता होना एक नौकरी है? आखिर पार्टी के प्रवक्ताओं को सैलरी क्यों नहीं मिलती और उनका खर्च कैसे चलता है?

Political Spokesperson Salary in India: टीवी डिबेट्स में बीजेपी का पक्ष मजबूती से रखने वाले शहजाद पूनावाला के इस्तीफे ने राजनीति के एक ऐसे पहलू पर चर्चा छेड़ दी है, जिस पर आमतौर पर ज्यादा बात नहीं होती, क्या राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ता कोई सैलरी पाते हैं? पूनावाला ने इस्तीफे की वजह बताते हुए अपनी आर्थिक परेशानियों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पार्टी के प्रवक्ता के तौर पर उन्हें कोई नियमित वेतन नहीं मिलता था और घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि बीजेपी समेत अन्य राजनीति पार्टियां प्रवक्ताओं को सैलरी क्यों नहीं देतीं?

क्या किसी राजनीतिक पार्टी का प्रवक्ता होना एक नौकरी है?

सीधी बात यह है कि आम तौर पर पार्टी का प्रवक्ता होना नियमित नौकरी जैसा पद नहीं होता। प्रवक्ता की जिम्मेदारी पार्टी की नीतियों और फैसलों को मीडिया, टीवी डिबेट और प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए जनता तक पहुंचाना होती है। लेकिन इस पद के साथ किसी सरकारी नौकरी की तरह तय मासिक वेतन या पे-स्केल जुड़ा नहीं होता। यही वजह है कि किसी नेता को राष्ट्रीय प्रवक्ता बना दिए जाने का मतलब यह नहीं है कि उसे हर महीने पार्टी की तरफ से तय सैलरी मिलेगी।

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राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ताओं को सैलरी क्यों नहीं मिलती?

भारतीय राजनीति में पार्टी के पदों को लंबे समय से संगठन और राजनीतिक जिम्मेदारी के तौर पर देखा जाता रहा है। बड़ी पार्टियों में हजारों कार्यकर्ता और अलग-अलग पदाधिकारी होते हैं। हर राजनीतिक पद को वेतन वाली नौकरी में बदलना पार्टियों के लिए अलग तरह की आर्थिक व्यवस्था खड़ी कर सकता है। इसके अलावा कई प्रवक्ता पहले से सांसद, विधायक, पूर्व मंत्री, वकील, कारोबारी या किसी दूसरे पेशे से जुड़े होते हैं। ऐसे लोगों की आय का स्रोत प्रवक्ता का पद नहीं, बल्कि उनका दूसरा काम या निर्वाचित पद हो सकता है।

क्या हर राजनीतिक पार्टी का प्रवक्ता बिना पैसे के काम करता है?

ऐसा कहना सही नहीं होगा। पार्टियों में प्रशासन, मीडिया, रिसर्च और दूसरे कामों के लिए कर्मचारियों और प्रोफेशनल्स को भुगतान किया जा सकता है। लेकिन सिर्फ प्रवक्ता नियुक्त होने से नियमित सैलरी मिलना जरूरी नहीं है। भुगतान की व्यवस्था पार्टी और व्यक्ति की भूमिका के हिसाब से अलग हो सकती है।

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शहजाद पूनावाला के मामले ने क्यों खड़े किए सवाल?

पूनावाला ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि घर का किराया और रोजमर्रा के खर्च राजनीति से नहीं चलते। उनका कहना था कि राजनीतिक पार्टियां अपने प्रवक्ताओं को सैलरी नहीं देतीं और उनके लिए आर्थिक रूप से राजनीति में बने रहना मुश्किल हो रहा था। सोशल मीडिया और 24 घंटे चलने वाले न्यूज चैनलों के दौर में प्रवक्ताओं की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। उन्हें लगातार टीवी डिबेट, मीडिया प्रतिक्रियाओं और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर पार्टी का पक्ष रखना पड़ता है। ऐसे में पूनावाला का इस्तीफा एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है कि अगर कोई व्यक्ति राजनीति को पूर्णकालिक रूप से अपना करियर बनाता है, लेकिन उसके पास न राजनीतिक विरासत है और न कोई दूसरा नियमित आय का जरिया, तो वह अपना घर कैसे चलाए?

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Anita Tanvi

अनीता तन्वी। मीडिया जगत में 15 साल से ज्यादा का अनुभव। मौजूदा समय में ये एशियानेट न्यूज हिंदी के साथ जुड़कर एजुकेशन सेगमेंट संभाल रही हैं। इन्होंने जुलाई 2010 में मीडिया इंडस्ट्री में कदम रखा और अपने करियर की शुरुआत प्रभात खबर से की। पहले 6 सालों में, प्रभात खबर, न्यूज विंग और दैनिक भास्कर जैसे प्रमुख प्रिंट मीडिया संस्थानों में राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, ह्यूमन एंगल और फीचर रिपोर्टिंग पर काम किया। इसके बाद, डिजिटल मीडिया की दिशा में कदम बढ़ाया। इन्हें प्रभात खबर.कॉम में एजुकेशन-जॉब/करियर सेक्शन के साथ-साथ, लाइफस्टाइल, हेल्थ और रीलिजन सेक्शन को भी लीड करने का अनुभव है। इसके अलावा, फोकस और हमारा टीवी चैनलों में इंटरव्यू और न्यूज एंकर के तौर पर भी काम किया है।Read More...
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