उद्धव ठाकरे से क्यों नाराज़ हैं शिवसेना (UBT) के सांसद? 'ऑपरेशन टाइगर' की इनसाइड स्टोरी

Published : Jun 17, 2026, 11:55 AM IST
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सार

क्या उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) में होने वाली है सबसे बड़ी बगावत? सात सांसदों के शिंदे गुट में जाने की चर्चा ने महाराष्ट्र की राजनीति गरमा दी है। क्या सांसदों की नाराजगी की वजह नेतृत्व से दूरी, फंड की कमी और संगठनात्मक कमजोरी है? 15 करोड़ रुपये के कथित ऑफर और दिल्ली बैठकों के पीछे छिपा असली खेल क्या है?

मुंबई/दिल्ली: साल 2022 का वो मंजर तो आपको याद ही होगा जब एकनाथ शिंदे ने विधायकों को साथ लेकर शिवसेना को दोफाड़ कर दिया था। ठीक चार साल बाद, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) अपने इतिहास के सबसे भीषण और गंभीर आंतरिक संकट के मुहाने पर आकर खड़ी हो गई है। संसद के आगामी मॉनसून सत्र से ठीक पहले, दिल्ली के सियासी गलियारों से जो खबरें आ रही हैं, वे उद्धव कैंप की नींद उड़ाने के लिए काफी हैं। लोकसभा में यूबीटी के कुल 9 सांसदों में से 7 सांसद बागी रुख अख्तियार कर चुके हैं और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के साथ उनकी डील बिल्कुल आखिरी चरण में बताई जा रही है।

'अपॉइंटमेंट' का वो लंबा इंतजार: आखिर क्यों सुलग रही थी सांसदों में नाराजगी?

राजनीति में कहा जाता है कि जब नेता अपने ही कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों से दूरी बना लेता है, तो बगावत की जमीन तैयार होने लगती है। सूत्रों के मुताबिक, बागी सांसदों की उद्धव ठाकरे से सबसे बड़ी नाराजगी की वजह बेहद चौंकाने वाली है।

  • मुलाकात की बंद खिड़की: सांसदों का आरोप है कि वे लंबे समय से 'जूनियर ठाकरे' (आदित्य ठाकरे) और उद्धव ठाकरे से आमने-सामने मिलने का वक्त मांग रहे थे, लेकिन बार-बार कोशिशों के बाद भी उन्हें अपॉइंटमेंट नहीं मिला।
  • सुलगती राजनीतिक चुनौतियां: सांसदों को स्थानीय स्तर पर विरोधी दलों से कड़ी टक्कर मिल रही थी। उन्होंने उद्धव ठाकरे से अपने निर्वाचन क्षेत्रों का दौरा करने का अनुरोध किया था, लेकिन नेतृत्व ने उनके क्षेत्रों की तरफ रुख नहीं किया।
  • फंड और समर्थन की किल्लत: सबसे ठोस और गंभीर शिकायत आर्थिक मोर्चे पर थी। आगामी स्थानीय निकाय और नगर निगम चुनावों के लिए सांसदों ने बार-बार फंड और संगठनात्मक मदद की गुहार लगाई थी, जिसे नजरअंदाज कर दिया गया। बिना वित्तीय और जमीनी सहायता के चुनाव मैदान में उतरने के डर ने सांसदों को असुरक्षित कर दिया।

कौन हैं वो 7 सांसद? जिन्होंने रची बगावत की पटकथा!  

इस पूरे घटनाक्रम का केंद्र अब मुंबई से 1,400 किलोमीटर दूर दिल्ली बन चुका है। बगावत की कमान संभाल रहे छह प्रमुख सांसदों-संजय दीना पाटिल, संजय देशमुख, नागेश पाटिल अष्टिकर, ओमराजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे और संजय जाधव के साथ-साथ राजाभाऊ वाजे भी इस खेल में शामिल बताए जा रहे हैं। सस्पेंस तब और गहरा गया जब इन सांसदों ने राष्ट्रीय राजधानी में एकनाथ शिंदे के बेटे और सांसद श्रीकांत शिंदे के सरकारी आवास पर महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से बेहद गोपनीय मुलाकात की। शिंदे गुट के MLC कृपाल तुमाने ने इस पूरे सियासी ड्रामे को "ऑपरेशन टाइगर" का नाम दिया है। तुमाने ने एक सनसनीखेज दावा करते हुए कहा: "सेना UBT के सात सांसद हमारे साथ जुड़ना चाहते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, उनके 16 विधायक भी हमारे सीधे संपर्क में हैं। यह बिल्कुल एक मेडिकल सर्जरी जैसा है; जांच हो चुकी है, रिपोर्ट आ चुकी है और अब बस डॉक्टर (एकनाथ शिंदे) के साथ मिलकर ऑपरेशन की आखिरी तारीख तय होना बाकी है।"

 

 

संजय राउत का ₹15 करोड़ वाला एटम बम और बीजेपी पर सीधा हमला

जैसे ही पार्टी के टूटने की खबरें आम हुईं, शिवसेना (UBT) के फायरब्रांड नेता संजय राउत ने मोर्चा संभाला और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक बड़ा राजनीतिक एटम बम फोड़ दिया। राउत ने सीधे तौर पर सांसदों की खरीद-फरोख्त का आरोप लगाते हुए लिखा: "महाराष्ट्र के सांसदों को खरीदने के लिए... आज रात हर एक को 15 करोड़ रुपये की अग्रिम राशि (एडवांस) दी जा रही है, यह जानकारी चौंकाने वाली और घिनौनी है!" राउत ने आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा कि उद्धव ठाकरे ने इन सभी सांसदों को जिताने के लिए दिन-रात एक किया था। उन्होंने दावा किया कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) पैसों का लालच देकर उनके सांसदों को तोड़ने की साजिश रच रही है, लेकिन बागी नेता जरूरी कानूनी संख्या नहीं जुटा पाएंगे। राउत ने कड़े शब्दों में कहा कि जो सच्चे शिवसैनिक हैं, वे बालासाहेब ठाकरे की विचारधारा को कभी नहीं छोड़ेंगे।

 

 

स्पीकर का दफ्तर और दलबदल कानून: कानूनी चक्रव्यूह में फंसी उद्धव सेना

अपनी पूरी राजनीतिक जमीन खिसकती देख उद्धव ठाकरे कैंप ने भी जवाबी कानूनी कार्रवाई तेज कर दी है। बगावत को कानूनी तौर पर अमान्य करने के लिए सेना UBT ने आनन-फानन में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को एक आधिकारिक पत्र लिखा है। इस पत्र में मांग की गई है कि संसद में केवल उनके गुट को ही 'अधिकृत शिवसेना' के तौर पर विशेष मान्यता दी जाए। साथ ही स्पीकर से गुहार लगाई गई है कि दिल्ली में मौजूद किसी भी अलग हुए बागी गुट को कोई अलग पहचान, दर्जा या संसदीय विशेषाधिकार न दिया जाए। पार्टी ने बागी सांसदों को चेतावनी दी है कि उनके पास संविधान की दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) के तहत दलबदल विरोधी कड़े प्रावधानों को लागू करने का पूरा अधिकार है। इस बीच, स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उद्धव ठाकरे ने आगामी 22 जून को मुंबई के पार्टी कार्यालय 'शिवालय' में अपने सभी विधायकों की एक आपातकालीन बैठक बुलाई है। अब देखना यह है कि दिल्ली में चल रहा 'ऑपरेशन टाइगर' कामयाब होता है या उद्धव ठाकरे आखिरी वक्त पर इस बगावत को नाकाम कर पाते हैं।

 

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