
नई दिल्ली: लद्दाख के पर्यावरण और संवैधानिक अधिकारों के लिए 26 दिनों तक कड़ी भूख हड़ताल पर बैठे प्रख्यात क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने आखिरकार अपना अनशन खत्म कर दिया है। लेकिन उनके इस फैसले के बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक आलोचनाओं का दौर शुरू हो गया। अब इन तमाम आलोचकों और सवालों का जवाब देने के लिए वांगचुक ने अस्पताल के बिस्तर से ही एक बेहद सनसनीखेज 24 मिनट का वीडियो जारी किया है। इस वीडियो में उन्होंने दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के भीतर की जो कहानी बयां की है, उसने पूरे देश को हैरत में डाल दिया है।
सोनम वांगचुक ने अपने वीडियो में सफदरजंग अस्पताल के प्रशासन और दिल्ली पुलिस पर बेहद गंभीर और चौंकाने वाले आरोप लगाए हैं। वांगचुक ने कहा, "वह कोई सामान्य अस्पताल नहीं था, बल्कि मेरे लिए एक जेल की तरह था। मुझे एक तरह से कैद कर दिया गया था।" उन्होंने हालात की तुलना तानाशाही देश से करते हुए कहा कि अस्पताल के आईसीयू (ICU) वार्ड में उनके साथ ऐसा बर्ताव किया गया जैसे वे 'नॉर्थ कोरिया' में रह रहे हों। उन्हें अपने कमरे से बाहर कदम तक रखने की इजाजत नहीं थी।
#BREAKING: Sonam Wangchuk shares video from Gurugram hospital bed after facing social media trolling and abuse by certain section for ending his hunger strike after meeting India’s Union Ministers. He asks, Do I need a Character Certificate from Anyone after 26 days long fast? pic.twitter.com/6Ob2QDXDpz
— Aditya Raj Kaul (@AdityaRajKaul) July 24, 2026
सोनम वांगचुक ने उस खौफनाक दौर का जिक्र करते हुए बताया कि उन्हें बाहरी दुनिया, अपने समर्थकों और लद्दाख से आए अपने करीबी दोस्तों तक से मिलने से पूरी तरह रोक दिया गया था। अस्पताल के कमरे में केवल तीन रिश्तेदारों के अलावा किसी की एंट्री नहीं थी। वांगचुक ने आरोप लगाया, "मेरे पास न तो मोबाइल फोन था और न ही लैपटॉप। मुझे अपने संदेश बाहर भेजने के लिए टिशू पेपर और नैपकिन का सहारा लेना पड़ा, जिस पर मैं हाथ से लिखकर बातें बाहर पहुंचाता था।" इस खुलासे ने आंदोलन को दबाने की कोशिशों की ओर इशारा कर एक नया रहस्य पैदा कर दिया है।
वीडियो में सोनम वांगचुक ने कहा कि उन्हें ICU में भर्ती किए जाने के बाद अपने कमरे से बाहर निकलने की अनुमति नहीं थी। उन्होंने आरोप लगाया कि सिर्फ तीन रिश्तेदारों को मिलने की इजाजत थी, जबकि उनके समर्थकों और लद्दाख से आए साथियों को भी अंदर नहीं आने दिया गया। इतना ही नहीं, मोबाइल फोन और लैपटॉप रखने पर भी रोक थी। उनका कहना है कि उन्हें अपने संदेश नैपकिन पर लिखकर भेजने पड़ते थे।
वांगचुक ने अस्पताल की व्यवस्था की तुलना उत्तर कोरिया से करते हुए कहा कि वहां संवाद की पूरी आजादी खत्म हो गई थी। उनके अनुसार, बाहरी दुनिया से लगभग पूरी तरह संपर्क टूट चुका था। इसी वजह से उन्होंने उस अनुभव को बेहद पीड़ादायक बताया।
“AFTER 26 DAYS OF HUNGER, DO I STILL NEED TO PROVE MY SINCERITY?”
A day after ending his 26 day hunger strike, Sonam Wangchuk has hit back at critics questioning his decision to accept the Centre’s assurances.
From his hospital bed, he asked
“Do I need a character certificate… pic.twitter.com/vntZwf2zVm— Ravi Prakash Official (@raviprakash_rtv) July 25, 2026
इस आंदोलन के दौरान केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग सबसे प्रमुख थी, जिसे अचानक छोड़ने पर वांगचुक की सबसे ज्यादा आलोचना हो रही है। इस सस्पेंस से पर्दा उठाते हुए वांगचुक ने कहा कि मंत्री का इस्तीफा लेना कभी भी उनका व्यक्तिगत या मुख्य मकसद नहीं था। वांगचुक ने तर्क दिया, "सरकार इस पूरे मामले को लेकर पहले ही भारी राजनीतिक कीमत चुका रही है। पूरे देश में उनकी साख खराब हो रही है और जनता में भारी गुस्सा है। मुझे पूरा भरोसा था कि वे इस दबाव में ज्यादा समय तक टिक नहीं पाएंगे और देर-सवेर इस्तीफा अपने आप हो जाएगा।"
वांगचुक ने साफ किया कि अनशन खत्म करने के पीछे कोई कमजोरी नहीं, बल्कि प्रदर्शनकारी छात्रों की सुरक्षा और उन पर होने वाली एफआईआर (FIR) जैसी कानूनी कार्रवाइयों से उन्हें बचाना उनकी सबसे बड़ी चिंता थी। वह नहीं चाहते थे कि युवाओं का भविष्य दांव पर लगे। गौरतलब है कि वांगचुक ने गुरुवार देर रात गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष व केंद्रीय मंत्री जे पी नड्डा, और केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह की मौजूदगी में अपनी पत्नी गीतांजलि आंग्मो के हाथों जूस पीकर अनशन तोड़ा। हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि भले ही उन्होंने अनशन खत्म कर दिया हो, लेकिन यह आंदोलन और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग आगे भी बदस्तूर जारी रहेगी।
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