
नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस (TMC) में जारी बगावत के बीच पार्टी के कई नेताओं का दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसे मुद्दे जमा होते गए, जिनकी वजह से पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ता गया। नेताओं का कहना है कि भ्रष्टाचार, नेतृत्व तक पहुंच की कमी और कार्यकर्ताओं व जनप्रतिनिधियों की अनदेखी जैसी समस्याओं ने नाराजगी को जन्म दिया, जो अब खुलकर सामने आ रही है। इसी बढ़ती नाराजगी को TMC और ममता बनर्जी के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती माना जा रहा है।
चार बार की सांसद शताब्दी रॉय, जो 2009 से ममता बनर्जी के साथ जुड़ी रही हैं, ने पार्टी नेतृत्व को लेकर बड़ा बयान दिया है। उनका कहना है कि हाल के वर्षों में ममता बनर्जी में काफी बदलाव आया है। एक इंटरव्यू में शताब्दी रॉय ने कहा, "दीदी बदल गई थीं। पिछले कुछ वर्षों में उनमें काफी बदलाव आया। मेरा उनके साथ भावनात्मक रिश्ता है, लेकिन मेरे लिए काम सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है और इसी वजह से मैंने यह फैसला लिया है।" उन्होंने संकेत दिया कि पार्टी के भीतर काम करने का माहौल पहले जैसा नहीं रहा और यही उनकी नाराजगी की एक बड़ी वजह बनी।
शताब्दी रॉय को हाल ही में उन बागी सांसदों के समूह का डिप्टी लीडर चुना गया है, जिन्होंने बीजेपी नेताओं से मुलाकात की और NDA को समर्थन देने की पेशकश की है।इस कदम को TMC से अलग होने की दिशा में बड़ा संकेत माना जा रहा है। वहीं बागी गुट की चीफ व्हिप काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया है कि उनके साथ सांसदों की संख्या बढ़कर 20 तक पहुंच गई है।
शताब्दी रॉय ने बगावत के पीछे की वजह बताते हुए कहा कि पार्टी नेतृत्व तक पहुंच न होना एक गंभीर समस्या थी। उनका दावा है कि पार्टी में फैसले लेने का अधिकार कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित हो गया था, जबकि बाकी नेताओं और सांसदों की राय को महत्व नहीं दिया जाता था। उन्होंने कहा, "मैं पार्टी इसलिए छोड़ रही हूं क्योंकि हमारी बात नहीं सुनी जाती थी। मैं लोगों के लिए काम करना चाहती थी, लेकिन किसी ने हमारी बात नहीं सुनी। ममता बनर्जी तक सिर्फ कुछ खास लोगों की ही पहुंच थी।" उनका कहना है कि इस स्थिति ने कई नेताओं और जनप्रतिनिधियों को निराश किया।
बागी गुट के सूत्रों ने भी शताब्दी रॉय की बातों का समर्थन किया है। उनका आरोप है कि राज्य सरकार के मंत्री और वरिष्ठ नेता सांसदों को पर्याप्त समय नहीं देते थे। सूत्रों का कहना है कि जनप्रतिनिधियों की मांगों और सुझावों को गंभीरता से नहीं लिया जाता था। कई महत्वपूर्ण फैसले बिना चर्चा और सलाह-मशविरा किए लिए जाते थे। उन्होंने दावा किया कि जब किसी नेता ने इन मुद्दों पर आवाज उठाने की कोशिश की, तो उसे चुप रहने की सलाह दी गई।
शताब्दी रॉय ने उन सवालों का भी जवाब दिया, जिनमें पूछा जा रहा है कि उन्होंने पहले इन मुद्दों को सार्वजनिक क्यों नहीं किया और अब क्यों बोल रही हैं। उन्होंने कहा कि अब हालात पहले से ज्यादा स्पष्ट हो चुके हैं। उनके मुताबिक, सत्ता में रहने के दौरान जो कुछ हुआ, अब उसकी तस्वीर साफ दिखाई दे रही है। रॉय ने कहा, "लोग पूछते हैं कि हम पहले क्यों नहीं बोले। लेकिन अब चीजें साफ हो रही हैं। हमने देखा कि जब तृणमूल सत्ता में थी तो क्या हुआ। अब मैं हालात को बेहतर तरीके से समझती हूं और अपने क्षेत्र के लोगों के हित में यह कदम उठा रही हूं।"
बंगाली फिल्म इंडस्ट्री से राजनीति में आईं शताब्दी रॉय ने पार्टी के कई नेताओं द्वारा लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों का भी समर्थन किया। उन्होंने कहा कि पार्टी के भीतर निचले स्तर से लेकर ऊपरी स्तर तक भ्रष्टाचार की शिकायतें देखने को मिली हैं, जिसने उन्हें बेहद निराश किया। शताब्दी रॉय ने कहा, "तृणमूल कांग्रेस में बहुत भ्रष्टाचार है। नीचे से लेकर ऊपर तक जिस तरह का भ्रष्टाचार देखने को मिला, उससे मैं काफी निराश हुई।" उन्होंने यह भी कहा कि उनकी व्यक्तिगत छवि साफ-सुथरी रही है और उन्हें अपनी छवि बचाने के लिए किसी राजनीतिक संरक्षण की जरूरत नहीं है।
TMC और राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा देने वाले वरिष्ठ नेता सुखेंदु शेखर रॉय ने भी पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी में बागी या अलग राय रखने वाले नेताओं को महत्व नहीं दिया जाता था। "हमारे लिए कोई जगह नहीं थी। हमारी बात कोई नहीं सुनता था।" उनका कहना था कि पार्टी के भीतर संवाद की कमी लगातार बढ़ती गई, जिससे कई नेताओं में असंतोष पैदा हुआ।
शताब्दी रॉय, काकोली घोष दस्तीदार और सुखेंदु शेखर रॉय जैसे नेताओं के बयानों ने TMC के भीतर चल रहे असंतोष को खुलकर सामने ला दिया है। भ्रष्टाचार, नेतृत्व तक सीमित पहुंच, सांसदों की अनदेखी और फैसलों में भागीदारी की कमी जैसे आरोपों ने पार्टी के अंदरूनी संकट को और गहरा कर दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ममता बनर्जी इस चुनौती से कैसे निपटती हैं और पार्टी में बढ़ती नाराजगी को किस तरह संभालती हैं।
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