
TMC Rebellion: तृणमूल कांग्रेस अपने 28 साल के इतिहास में सबसे बड़े झटकों में से एक का सामना कर रही है। पश्चिम बंगाल में करारी हार के कुछ हफ़्तों बाद ही, ममता बनर्जी की पार्टी विधानसभा में पहले ही एक बड़ा बंटवारा देख चुकी है और अब उसे संसद में भी पार्टी के दो हिस्सों में बंटने का खतरा सता रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बागी सांसदों के गुट ने 19 सांसदों का समर्थन हासिल कर लिया है, जो पार्टी की संसदीय ताकत का दो-तिहाई हिस्सा है और एक अलग गुट बनाने के लिए जरूरी है। यूसुफ पठान, सयानी घोष और माला रॉय उन सांसदों में शामिल हैं जिन्होंने बागी सूची पर हस्ताक्षर किए हैं, जिससे पार्टी पूरी तरह से दो हिस्सों में बंटने की कगार पर पहुंच गई है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में बागी सांसदों ने एक अलग संसदीय गुट बनाया है और NDA को समर्थन देने का वादा किया है। बागी सांसदों की लिस्ट में अब तक जो नाम सामने आए हैं, उनमें..
दल-बदल विरोधी कानून के तहत, किसी गुट को स्वतः अयोग्य घोषित होने से बचने के लिए पार्टी की कुल संख्या-बल का कम से कम दो-तिहाई समर्थन हासिल करना ज़रूरी होता है। तृणमूल के पास 28 सीटें हैं, इसलिए बागी गुट को अपने कदम को कानूनी रूप से सही ठहराने के लिए 19 सांसदों के समर्थन की जरूरत है, जो उन्हें मिल चुका है।
तृणमूल का संगठनात्मक संकट इस हफ़्ते की शुरुआत में तब सार्वजनिक हुआ, जब बंगाल विधानसभा में पार्टी के भीतर शुरू हुई बगावत संसद तक पहुंच गई। संसद में यह फूट तब पड़ी जब 58 तृणमूल विधायकों (बागी गुट का दावा है कि अब यह संख्या बढ़कर 64 हो गई है) ने पार्टी नेतृत्व की बात न मानते हुए, पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार शोभनदेब चट्टोपाध्याय के बजाय निष्कासित विधायक रिताब्रता बनर्जी को विपक्ष का नेता बनाने का समर्थन किया।
लगातार हो रही बगावतों ने ममता बनर्जी और TMC नेतृत्व के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। 1998 में पार्टी की स्थापना के बाद शायद यह पहला मौका है जब संगठनात्मक नियंत्रण, विधायी ताकत, संसदीय संख्या बल और राजनीतिक वैधता को लेकर इतनी गंभीर स्थिति पैदा हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संकट और गहराता है तो इसका असर पार्टी की राष्ट्रीय और राज्य स्तर की राजनीति पर भी पड़ सकता है।
संकट केवल लोकसभा और विधानसभा तक सीमित नहीं रहा। हाल के दिनों में राज्यसभा में भी पार्टी को झटके लगे हैं। वरिष्ठ नेता सुखेंदु शेखर रॉय ने पहले राज्यसभा और पार्टी दोनों से इस्तीफा दिया। इसके बाद सुष्मिता देव ने भी राज्यसभा सदस्यता और TMC छोड़ने का फैसला किया। इन इस्तीफों ने पार्टी के भीतर बढ़ते मतभेदों को और अधिक उजागर कर दिया है।
विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा—तीनों स्तरों पर सामने आई असंतोष की घटनाओं ने तृणमूल कांग्रेस को मुश्किल स्थिति में ला खड़ा किया है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि पार्टी नेतृत्व इस संकट से कैसे निपटता है और क्या बागी नेताओं को वापस संगठन में लाने की कोई कोशिश होती है या फिर यह राजनीतिक खींचतान और आगे बढ़ती है।
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